राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय आयोजनों से सर्वांगीण विकास : ज्ञान, शोध, संस्कृति, पर्यटन और रोजगार का व्यापक अवसर
— श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सेमिनार, शोध कार्यशालाएं, सम्मेलन, संगोष्ठियां, अकादमिक संवाद तथा अवार्ड समारोह को सामान्यतः शैक्षणिक या औपचारिक आयोजन के रूप में देखा जाता है। मंच तैयार होता है, विशेषज्ञ और प्रतिभागी आते हैं, शोध एवं विचारों का आदान-प्रदान होता है, सम्मान प्रदान किए जाते हैं और कार्यक्रम समाप्त हो जाता है।
लेकिन किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय आयोजन का वास्तविक प्रभाव इससे कहीं अधिक व्यापक होता है। जब देश के अलग-अलग राज्यों अथवा विदेशों से लोग किसी शहर में किसी कार्यक्रम में भाग लेने पहुंचते हैं, तो वे केवल सभागार तक सीमित नहीं रहते। उनकी यात्रा रेलवे, बस, विमान, टैक्सी और स्थानीय परिवहन से जुड़ती है; वे होटल एवं गेस्ट हाउस में ठहरते हैं, स्थानीय भोजन करते हैं, बाजारों में जाते हैं, पर्यटन स्थलों का भ्रमण करते हैं तथा वहां की भाषा, कला, संस्कृति, साहित्य और जीवनशैली को समझते हैं।
इस प्रकार एक आयोजन ज्ञान और विचारों के आदान-प्रदान के साथ-साथ पर्यटन, रोजगार, स्थानीय व्यापार, सांस्कृतिक संबंध, शोध सहयोग और क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को भी गति दे सकता है।
1. दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय आयोजनों को केवल खर्च या औपचारिक कार्यक्रम के रूप में देखने की मानसिकता बदलनी होगी। प्रत्येक ऐसा आयोजन किसी शहर और राज्य के लिए एक संभावित Knowledge, Research, Tourism and Economic Opportunity हो सकता है।
यदि किसी शहर में वर्षभर 10, 20 अथवा उससे अधिक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित होते हैं और प्रत्येक में देश के विभिन्न हिस्सों से सैकड़ों प्रतिभागी आते हैं, तो इन यात्राओं और ठहराव का संचयी आर्थिक प्रभाव काफी महत्वपूर्ण हो सकता है।
इसलिए ऐसे आयोजनों के Academic Impact, Tourism Impact, Economic Impact, Cultural Impact और Social Impact का भी आकलन किया जाना चाहिए।
2. पर्यटन विभाग की सक्रिय भूमिका आवश्यक
पर्यटन विभाग को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय आयोजनों को एक तैयार पर्यटक समूह के रूप में देखना चाहिए।
कार्यक्रम में बाहर से आने वाले प्रतिभागियों को—
पर्यटन स्थलों की जानकारी,
पर्यटन पुस्तिकाएं और मानचित्र,
स्थानीय गाइड,
आधे दिन एवं एक दिन के पर्यटन पैकेज,
ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्थलों के भ्रमण,
संग्रहालयों की जानकारी,
स्थानीय कला एवं हस्तशिल्प,
स्थानीय खान-पान,
सांस्कृतिक कार्यक्रम
से जोड़ा जा सकता है।
यदि 200 प्रतिभागियों में से केवल 50 प्रतिभागी भी कार्यक्रम के बाद स्थानीय पर्यटन करते हैं, तो होटल, परिवहन, टिकट, भोजन, गाइड, स्थानीय बाजार और अन्य सेवाओं में अतिरिक्त आर्थिक गतिविधि उत्पन्न होती है।
3. संस्कृति विभाग स्थानीय संस्कृति को वैश्विक मंच दे सकता है
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सांस्कृतिक विविधता है। किसी राज्य में राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय आयोजन हो तो वहां के लोकगीत, लोकनृत्य, संगीत, साहित्य, हस्तशिल्प, पारंपरिक खान-पान और लोक परंपराओं को कार्यक्रम से जोड़ा जा सकता है।
इससे दोहरा लाभ होगा—बाहर से आए प्रतिभागियों को स्थानीय संस्कृति को समझने का अवसर मिलेगा और स्थानीय कलाकारों, साहित्यकारों तथा कारीगरों को मंच और आर्थिक अवसर प्राप्त होंगे।
4. विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों की भूमिका
विश्वविद्यालयों के लिए ऐसे आयोजन केवल सभागार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होने चाहिए।
इनके माध्यम से शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी देश-विदेश के विशेषज्ञों से प्रत्यक्ष संवाद कर सकते हैं। एक सेमिनार से आगे चलकर—
Joint Research,
Joint Publication,
Faculty Exchange,
Student Exchange,
Collaborative Projects,
Research Workshops
जैसी गतिविधियों की शुरुआत हो सकती है।
इससे विश्वविद्यालयों का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय अकादमिक नेटवर्क मजबूत होता है।
5. शोध कार्यशालाएं भविष्य के ज्ञान नेटवर्क की आधारशिला
शोध कार्यशालाओं का महत्व विशेष रूप से अधिक है। इनमें शोधार्थियों को शोध-पद्धति, डेटा संग्रह, डेटा विश्लेषण, शोध लेखन, प्रकाशन, शोध नैतिकता, नवीन तकनीक और अकादमिक प्रस्तुति जैसे विषयों पर विशेषज्ञ मार्गदर्शन प्राप्त होता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अलग-अलग राज्यों के शोधार्थियों और विशेषज्ञों के बीच प्रत्यक्ष संपर्क बनता है। यही संपर्क आगे चलकर संयुक्त शोध परियोजनाओं और नए अकादमिक नेटवर्क का आधार बन सकता है।
6. एक राज्य से दूसरे राज्य की संस्कृति को समझने का अवसर
राष्ट्रीय आयोजन Inter-State Cultural Exchange का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
मध्य प्रदेश का व्यक्ति केरल जाता है, उत्तर प्रदेश का शोधार्थी तेलंगाना जाता है, राजस्थान का साहित्यकार असम जाता है और महाराष्ट्र का सामाजिक कार्यकर्ता बिहार पहुंचता है।
वह केवल कार्यक्रम में भाग नहीं लेता, बल्कि वहां की भाषा, बोली, साहित्य, खान-पान, कला, परंपराओं, जीवनशैली और सामाजिक संरचना को भी समझता है।
इससे विभिन्न राज्यों के लोगों के बीच परस्पर सम्मान, समझ और आत्मीयता बढ़ती है तथा राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक संबंध मजबूत होते हैं।
7. स्थानीय अर्थव्यवस्था में धन का प्रवाह
एक बाहर से आने वाले प्रतिभागी की यात्रा अपने साथ अनेक आर्थिक गतिविधियां जोड़ती है—
यात्रा → होटल → भोजन → स्थानीय परिवहन → कार्यक्रम → पर्यटन → खरीदारी → स्थानीय उत्पाद → सांस्कृतिक अनुभव।
इस पूरी श्रृंखला में अनेक लोग प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक रूप से जुड़े होते हैं।
इसलिए किसी आयोजन का वास्तविक आर्थिक प्रभाव केवल आयोजन समिति के बजट से निर्धारित नहीं किया जा सकता। उसका प्रभाव स्थानीय होटल, रेस्टोरेंट, परिवहन, बाजार, पर्यटन, प्रिंटिंग, फोटोग्राफी, तकनीकी सेवाओं और छोटे व्यवसायों तक पहुंचता है।
8. रोजगार और स्थानीय उद्यमिता
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय आयोजनों से अनेक क्षेत्रों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा हो सकता है, जैसे—
आयोजन प्रबंधन,
मंच व्यवस्था,
ध्वनि एवं प्रकाश,
फोटोग्राफी एवं वीडियोग्राफी,
सुरक्षा,
परिवहन,
खान-पान,
होटल एवं आतिथ्य,
पर्यटन,
प्रिंटिंग,
स्टेशनरी,
स्थानीय उत्पाद,
स्मृति-चिह्न।
यदि स्थानीय युवाओं और छोटे उद्यमियों को इन गतिविधियों से जोड़ा जाए तो आयोजन स्थानीय रोजगार के लिए भी उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।
9. महिला स्वयं सहायता समूहों को जोड़ने की संभावना
स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूहों को ऐसे आयोजनों में विशेष स्थान दिया जा सकता है।
वे अपने—
खाद्य उत्पाद,
हस्तशिल्प,
वस्त्र एवं कलात्मक सामग्री,
पैकेजिंग उत्पाद,
स्थानीय सामग्री,
स्मृति-चिह्न
प्रदर्शित और बेच सकती हैं।
इससे प्रतिभागियों को स्थानीय उत्पादों की जानकारी मिलेगी तथा महिला समूहों को नए ग्राहक और बाजार प्राप्त हो सकते हैं।
10. स्थानीय बाजार और उत्पादों को राष्ट्रीय मंच
कार्यक्रम स्थल पर स्थानीय उत्पादों की प्रदर्शनी लगाई जा सकती है। इसमें हस्तशिल्प, पुस्तकें, पारंपरिक वस्तुएं, स्थानीय खाद्य सामग्री, महिला समूहों के उत्पाद, कला सामग्री और क्षेत्रीय स्मृति-चिह्न शामिल किए जा सकते हैं।
इससे बाहर से आने वाले प्रतिभागी केवल ज्ञान लेकर वापस नहीं जाएंगे, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जुड़ेंगे।
11. GKSSS का अनुभव
गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS) द्वारा विभिन्न राज्यों में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के सेमिनार, शोध कार्यशालाएं, सम्मेलन, अकादमिक संवाद एवं सम्मान समारोह आयोजित किए जाते रहे हैं।
इन आयोजनों में शिक्षाविद, शोधकर्ता, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता, विद्यार्थी, विशेषज्ञ और विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधि भाग लेते हैं।
जब प्रतिभागी किसी दूसरे राज्य में पहुंचते हैं, तो उनका प्रभाव केवल कार्यक्रम स्थल तक सीमित नहीं रहता। वे यात्रा करते हैं, होटल में ठहरते हैं, भोजन करते हैं, स्थानीय परिवहन का उपयोग करते हैं, पर्यटन स्थलों का भ्रमण करते हैं, बाजारों में जाते हैं और स्थानीय संस्कृति से परिचित होते हैं।
इस अनुभव से स्पष्ट है कि ऐसे कार्यक्रमों का प्रभाव बहुआयामी है और इसे सरकारी नीति तथा विकास की दृष्टि से भी समझने की आवश्यकता है।
12. सरकार को आयोजनों का सहयोगी बनना चाहिए
सरकारी सहयोग केवल अनुमति, औपचारिक उपस्थिति या सभागार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होना चाहिए।
जब किसी संस्था द्वारा किसी राज्य में राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय आयोजन प्रस्तावित हो, तो संबंधित विभाग आयोजकों से संवाद कर यह जान सकते हैं कि कितने प्रतिभागी बाहर से आ रहे हैं और उन्हें राज्य के पर्यटन, संस्कृति, स्थानीय उत्पाद एवं शोध संस्थानों से किस प्रकार जोड़ा जा सकता है।
यह वास्तविक Public–Institutional Partnership का उदाहरण होगा।
13. पर्यटन, संस्कृति, शिक्षा और रोजगार विभागों में समन्वय
ऐसे आयोजनों को सफल बनाने के लिए विभिन्न विभागों के बीच समन्वय आवश्यक है।
पर्यटन विभाग—पर्यटन भ्रमण और स्थानीय आकर्षणों से जोड़े।
संस्कृति विभाग—स्थानीय कला, संगीत, साहित्य और लोक परंपराओं को मंच दे।
उच्च शिक्षा विभाग—विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को जोड़े।
उद्योग एवं रोजगार विभाग—स्थानीय उद्यमियों और रोजगार अवसरों को जोड़े।
स्थानीय प्रशासन—आवागमन, सुरक्षा, स्वच्छता और अन्य व्यवस्थाओं में सहयोग करे।
यदि सभी विभाग मिलकर काम करें तो एक सेमिनार पूरे क्षेत्र के विकास का माध्यम बन सकता है।
14. Conference Tourism और Research Tourism की आवश्यकता
भारत में पर्यटन के नए क्षेत्रों को विकसित करने की आवश्यकता है। इसी क्रम में Conference Tourism, Academic Tourism और Research Tourism को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
ऐसे शहरों की पहचान की जा सकती है जहां विश्वविद्यालय, शोध संस्थान, ऐतिहासिक विरासत, प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक आकर्षण, होटल और परिवहन सुविधाएं उपलब्ध हों।
इन शहरों को Knowledge and Conference Tourism Destinations के रूप में विकसित किया जा सकता है।
15. कार्यक्रम के प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन
किसी आयोजन का मूल्यांकन केवल प्रतिभागियों की संख्या के आधार पर नहीं होना चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए—
कितने प्रतिभागी बाहर से आए?
कितने राज्यों का प्रतिनिधित्व हुआ?
कितने दिन प्रतिभागी शहर में रुके?
कितने होटल कमरों का उपयोग हुआ?
स्थानीय परिवहन का कितना उपयोग हुआ?
कितने पर्यटन स्थलों का भ्रमण हुआ?
स्थानीय बाजार को कितना लाभ मिला?
कितने स्थानीय लोगों को रोजगार मिला?
कितने शोध सहयोग विकसित हुए?
कितने विश्वविद्यालय और संस्थान जुड़े?
कितने सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुए?
इस प्रकार Economic, Tourism, Cultural, Academic and Social Impact Assessment की व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
16. एक सेमिनार से बनने वाली विकास-श्रृंखला
एक प्रतिभागी अपने शहर से निकलता है → दूसरे शहर पहुंचता है → रेल, बस या विमान का उपयोग करता है → होटल में ठहरता है → स्थानीय भोजन करता है → सेमिनार में भाग लेता है → शोध एवं ज्ञान साझा करता है → स्थानीय संस्कृति को समझता है → पर्यटन स्थल देखता है → स्थानीय उत्पाद खरीदता है → नए लोगों से संपर्क करता है → भविष्य के शोध एवं सहयोग की संभावना बनती है।
यही किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय आयोजन का वास्तविक बहुआयामी प्रभाव है।
17. वर्षभर के आयोजनों का संचयी प्रभाव
यदि कोई संस्था वर्ष में छह-सात या उससे अधिक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम अलग-अलग राज्यों में आयोजित करती है, तो प्रत्येक आयोजन अपने साथ आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और अकादमिक गतिविधियों का एक छोटा प्रभाव लेकर आता है।
जब ऐसे कार्यक्रम पूरे वर्ष लगातार होते हैं, तो उनका प्रभाव Cumulative Impact का रूप ले सकता है।
हजारों प्रतिभागियों की यात्राएं, होटल में ठहराव, स्थानीय परिवहन, भोजन, पर्यटन, खरीदारी और संस्थागत संपर्क मिलकर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण Multiplier Effect पैदा कर सकते हैं।
18. प्रतिभागी केवल प्रतिभागी नहीं—एक संभावित सांस्कृतिक एवं ज्ञान दूत
सरकार को यह समझना होगा कि बाहर से आने वाला प्रत्येक प्रतिभागी केवल एक कार्यक्रम में शामिल होने वाला व्यक्ति नहीं है।
वह संभावित—
पर्यटक,
ग्राहक,
ज्ञान साझेदार,
शोध सहयोगी,
सांस्कृतिक दूत,
संस्थागत नेटवर्क पार्टनर
भी है।
यदि उसे स्थानीय समाज और अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाए तो उसका प्रभाव लंबे समय तक बना रह सकता है।
19. “Seminar to Development” मॉडल
अब आवश्यकता है कि राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय आयोजनों को “Seminar to Development” मॉडल से जोड़ा जाए।
Academic Component
सेमिनार, शोध-पत्र, शोध कार्यशाला और अकादमिक संवाद।
Cultural Component
स्थानीय कला, संगीत, नृत्य, साहित्य और लोक संस्कृति।
Tourism Component
स्थानीय पर्यटन स्थलों का भ्रमण।
Economic Component
स्थानीय बाजार और व्यवसायों से जुड़ाव।
Employment Component
स्थानीय सेवाओं एवं युवाओं के लिए रोजगार अवसर।
Women Empowerment Component
महिला स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय उद्यमियों की भागीदारी।
Youth Component
विद्यार्थियों और युवाओं को विशेषज्ञों एवं संस्थानों से जोड़ना।
Research Component
विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के बीच संयुक्त परियोजनाएं।
20. निष्कर्ष
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सेमिनार, शोध कार्यशालाएं, सम्मेलन और अवार्ड समारोह को केवल एक दिन का कार्यक्रम या खर्च मानना उनके वास्तविक महत्व को सीमित करना है।
ये आयोजन—
ज्ञान को जोड़ते हैं।
शोध को आगे बढ़ाते हैं।
राज्यों को जोड़ते हैं।
भाषाओं और संस्कृतियों को करीब लाते हैं।
पर्यटन को बढ़ावा देते हैं।
स्थानीय बाजार को ग्राहक देते हैं।
रोजगार और उद्यमिता के अवसर पैदा करते हैं।
महिला समूहों को बाजार उपलब्ध करा सकते हैं।
स्थानीय कलाकारों को मंच देते हैं।
विश्वविद्यालयों को नए शोध सहयोगी देते हैं।
और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में धन का प्रवाह बढ़ाते हैं।
इसलिए सरकार और संबंधित विभागों की भूमिका केवल कार्यक्रम में उपस्थित होने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें यह देखना चाहिए कि किसी आयोजन से उत्पन्न अवसर को पर्यटन, संस्कृति, शिक्षा, शोध, रोजगार और स्थानीय आर्थिक विकास से किस प्रकार जोड़ा जा सकता है।
गोपाल किरन समाजसेवी संस्था जैसे संगठन जब विभिन्न राज्यों में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित करते हैं और विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं, तो वे केवल कार्यक्रम आयोजित नहीं करते, बल्कि ज्ञान, संस्कृति, पर्यटन, सामाजिक संबंध और आर्थिक गतिविधियों के बीच सेतु का काम भी करते हैं।
अंतिम संदेश
“एक सेमिनार केवल मंच पर होने वाला संवाद नहीं है; यह ज्ञान, शोध, संस्कृति, पर्यटन, रोजगार, स्थानीय बाजार और मानवीय संबंधों को जोड़ने वाली विकास-श्रृंखला है। आवश्यकता केवल कार्यक्रम आयोजित करने की नहीं, बल्कि उसके व्यापक प्रभाव को पहचानकर उसे क्षेत्रीय विकास में बदलने की है।”
— श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर