मैथिलीशरण गुप्त : राष्ट्र की आत्मा के अमर गायक

- आज के समय में गुप्त जी को पढ़ना, भारत को समझना है
(शशि श्रेया, कवयित्री, लखनऊ)
भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय अस्मिता और मानवीय संवेदनाओं को यदि किसी कवि ने सरल, सहज और जनभाषा में सबसे प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है, तो वे राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त हैं। उनकी जयंती केवल एक महान साहित्यकार का स्मरण नहीं, बल्कि उस वैचारिक विरासत को प्रणाम करने का अवसर है, जिसने भारतीय समाज को आत्मगौरव, राष्ट्रभक्ति और मानवीय मूल्यों का पाठ पढ़ाया।
आज जब दुनिया तकनीक की गति से आगे बढ़ रही है और मनुष्य अपने भीतर की संवेदनाओं से दूर होता जा रहा है, तब गुप्त जी की कविता पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है। उन्होंने साहित्य को मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला प्रकाश-स्तंभ माना। उनकी लेखनी ने भारतीय संस्कृति की आत्मा को शब्द दिए और उन शब्दों ने पीढ़ियों को विचार दिए।
'भारत-भारती' में उन्होंने केवल भारत का इतिहास नहीं लिखा, बल्कि भारत के भविष्य का स्वप्न भी देखा। 'साकेत' में मर्यादा, त्याग और परिवार की गरिमा का अद्भुत चित्रण है, जबकि 'यशोधरा' में नारी के मौन, धैर्य और आत्मबल को ऐसा स्वर मिला, जो आज भी भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर है। गुप्त जी ने नारी को करुणा की प्रतीक नहीं, बल्कि शक्ति, त्याग और चेतना की धुरी के रूप में स्थापित किया।
लखनऊ की साहित्यिक परंपरा ने हमें शब्दों में विनम्रता, विचारों में गहराई और अभिव्यक्ति में तहज़ीब का संस्कार दिया है। उसी परंपरा की एक साधक होने के नाते मेरा मानना है कि साहित्य तभी सार्थक है, जब वह समाज को जोड़ने, मनुष्य को बेहतर बनाने और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का भाव जगाने का कार्य करे। मैथिलीशरण गुप्त का संपूर्ण साहित्य इसी आदर्श का जीवंत उदाहरण है।
आज का समय संवाद से अधिक विवाद का और अभिव्यक्ति से अधिक प्रतिक्रिया का होता जा रहा है। ऐसे दौर में गुप्त जी की वाणी हमें संयम, समरसता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का संदेश देती है। वे हमें याद दिलाते हैं कि राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता; राष्ट्र अपने नागरिकों के चरित्र, संस्कार और साझा मूल्यों से बनता है। यदि साहित्य इन मूल्यों को सशक्त करता है, तभी वह कालजयी बनता है।
एक कवयित्री के रूप में मैं मानती हूँ कि कविता का उद्देश्य केवल मंच पर तालियाँ बटोरना नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर सोई हुई संवेदनाओं को जगाना है। कविता तब सफल होती है, जब वह किसी निराश व्यक्ति को आशा दे, किसी भ्रमित युवा को दिशा दे और समाज को अपने कर्तव्यों का बोध कराए। यही राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की सबसे बड़ी साहित्यिक विरासत है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी गुप्त जी को केवल पाठ्यपुस्तकों में न पढ़े, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन का हिस्सा बनाए। क्योंकि जो राष्ट्र अपने साहित्यकारों को भूल जाता है, वह धीरे-धीरे अपनी सांस्कृतिक स्मृति भी खो देता है।
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन। उनकी लेखनी आने वाली पीढ़ियों को इसी प्रकार राष्ट्रप्रेम, मानवीय संवेदना और सांस्कृतिक गौरव का मार्ग दिखाती रहे—यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

"कलम बनी जब राष्ट्र की वाणी, जागा जन-विश्वास
 आज भी देता गुप्त साहित्य, जीवन को प्रकाश 
 संस्कारों की शीतल सरिता, बहती जिनके साथ 
 उनकी अमर विरासत रखे, भारत का हर हाथ 
 नमन तुम्हें हे राष्ट्रकवि, वंदन बारंबार
 जब तक हिंदी जीवित होगी, अमर रहेगा नाम तुम्हार "

posted by Admin
20

Advertisement

sandhyadesh
sandhyadesh
sandhyadesh
sandhyadesh
Get In Touch

Padav, Dafrin Sarai, Gwalior (M.P.)

98930-23728

sandhyadesh@gmail.com

Follow Us

© Sandhyadesh. All Rights Reserved. Developed by Anuj Mathur

<1-------Google-aNALY-------->