अनकहा, अनपढ़ा पढ़ गईं चूड़ियाँ..." — यह केवल एक कविता नहीं, बल्कि प्रेम के उन अनकहे एहसासों की मधुर अभिव्यक्ति है जिन्हें शब्दों से अधिक दिल समझता है।
प्रख्यात कवयित्री शशि श्रेया अपनी संवेदनशील लेखनी से साधारण प्रतीकों को भी असाधारण भावनाओं का रूप दे देती हैं। इस रचना में चूड़ियाँ केवल श्रृंगार का आभूषण नहीं, बल्कि प्रेम की मौन दूत बनकर मन की हर धड़कन का राज़ खोलती नज़र आती हैं। हर पंक्ति में लखनऊ की तहज़ीब की नज़ाकत, प्रेम की मासूमियत और भावनाओं की गहराई सहज ही महसूस होती है।
उनकी लेखनी की यही विशेषता है कि वह पाठक को केवल कविता पढ़ने नहीं देती, बल्कि उसे जीने पर विवश कर देती है। शब्दों का चयन, भावों की कोमलता और अभिव्यक्ति की सादगी इस रचना को सीधे हृदय तक पहुँचा देती है।
"अनकहा, अनपढ़ा पढ़ गयीं चूड़ियाँ।
मन पे उन्माद सी चढ़ गयीं चूड़ियाँ।
मैंने क़दमों को रोका बहुत था मगर,
प्रेम की राह पर बढ़ गयीं चूड़ियाँ।।"
Shashi shreya