भक्ति से ही प्रेम होता है—आचार्य डॉ. विष्णु नारायण तिवारी
## गीता ज्ञान यज्ञ के षष्ठ चरण में राजविद्याराजगुह्य योग के प्रथम पाँच श्लोकों का भावपूर्ण विवेचन
**ग्वालियर, 15 अगस्त 2026।**
“**भक्ति से ही प्रेम होता है और प्रेम के माध्यम से ही भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना जागृत होती है।**” यह विचार गीता मनीषी एवं केन्द्रीय महामन्त्री, विश्वगीताप्रतिष्ठानम् के **आचार्य डॉ. विष्णु नारायण तिवारी** ने शनिवार को गंगा दास की बड़ी शाला, लक्ष्मी बाई कॉलोनी, पड़ाव, लश्कर, ग्वालियरम् में आयोजित **गीता ज्ञान यज्ञ (षष्ठ चरण) के राजविद्याराजगुह्य योग** के प्रथम दिवस व्यक्त किए।
विक्रम संवत् 2083 के श्रावण शुक्ल तृतीया से पंचमी तक, **15 से 17 अगस्त 2026** तक आयोजित इस तीन दिवसीय गीता ज्ञान यज्ञ में प्रतिदिन अपराह्न **3 से 6 बजे तक गीता स्वाध्याय एवं प्रवचन** हो रहे हैं। प्रथम दिवस आचार्य डॉ. तिवारी ने श्रीमद्भगवद्गीता के **नवम अध्याय ‘राजविद्याराजगुह्य योग’ के श्लोक 1 से 5** तक की विस्तृत एवं दार्शनिक व्याख्या की।
### राजविद्या और राजगुह्य का स्वरूप
आचार्य डॉ. तिवारी ने नवम अध्याय के प्रारम्भिक श्लोकों की व्याख्या करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को ऐसा ज्ञान प्रदान करते हैं जो समस्त विद्याओं में श्रेष्ठ और समस्त रहस्यों में सर्वोच्च है। यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, बल्कि अनुभूति और आचरण से जीवन को रूपान्तरित करने वाला ज्ञान है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
> **श्रीभगवानुवाच**
> इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
> ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥ ९.१॥
आचार्य ने बताया कि भगवान अर्जुन को ‘अनसूयवे’ अर्थात् दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धापूर्वक सुनने वाले शिष्य के रूप में संबोधित करते हैं। **ज्ञान के साथ विज्ञान** का होना आवश्यक है। केवल शास्त्र को जान लेना पर्याप्त नहीं है; जब वह ज्ञान जीवन में अनुभूत होकर आचरण का अंग बनता है, तब वह विज्ञान कहलाता है और मनुष्य अशुभ से मुक्त होने की दिशा में अग्रसर होता है।
दूसरे श्लोक में भगवान इस ज्ञान की महिमा बताते हैं—
> **राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।**
> प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥ ९.२॥
उन्होंने कहा कि यह **राजविद्या** है क्योंकि यह समस्त विद्याओं में श्रेष्ठ है और **राजगुह्य** है क्योंकि यह परमात्मतत्त्व का अत्यन्त गूढ़ रहस्य प्रकट करती है। इसकी विशेषता यह है कि इसका फल केवल भविष्य में मिलने वाली किसी कल्पना पर आधारित नहीं, बल्कि साधना और भक्ति के माध्यम से जीवन में प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है। यह धर्मसम्मत, सहज आचरण योग्य और अविनाशी है।
### श्रद्धा के बिना साधना अधूरी
आचार्य ने तीसरे श्लोक—
> **अश्रद्दधाना: पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।**
> अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥ ९.३॥
का उल्लेख करते हुए कहा कि गीता के मार्ग में **श्रद्धा का अत्यन्त महत्त्व** है। श्रद्धा के अभाव में मनुष्य परम सत्य की ओर बढ़ने के स्थान पर बार-बार संसार के मोह, जन्म-मृत्यु और विषय-वासनाओं के चक्र में उलझा रहता है। श्रद्धा अंधविश्वास नहीं, बल्कि सत्य को जानने और उसके अनुसार जीवन जीने की आन्तरिक तत्परता है।
### सम्पूर्ण जगत में परमात्मा की व्याप्ति
चतुर्थ श्लोक—
> **मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।**
> मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥ ९.४॥
की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण सम्पूर्ण चराचर जगत में अपनी अव्यक्त सत्ता से व्याप्त हैं। संसार की प्रत्येक वस्तु परमात्मा की सत्ता पर आश्रित है। इसलिए भारतीय दर्शन में समस्त प्राणियों के प्रति करुणा, सम्मान और आत्मीयता की भावना का आधार भी यही आध्यात्मिक दृष्टि है।
आचार्य ने कहा कि जब साधक को प्रत्येक जीव में परमात्मा की सत्ता का अनुभव होने लगता है, तब उसके व्यवहार में स्वाभाविक रूप से **प्रेम, सेवा, करुणा और समभाव** उत्पन्न होते हैं।
### परमात्मा की अद्भुत योगशक्ति
पाँचवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण इस रहस्य को और स्पष्ट करते हैं—
> **न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।**
> भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥ ९.५॥
आचार्य डॉ. तिवारी ने कहा कि भगवान की सत्ता सम्पूर्ण सृष्टि का आधार है, फिर भी परमात्मा किसी एक भौतिक सीमा में बंधे हुए नहीं हैं। यही भगवान की **ऐश्वर्ययुक्त योगशक्ति** है। परमात्मा सबका पालन करने वाले, सबके मूल कारण और समस्त प्राणियों के भावन करने वाले हैं।
उन्होंने कहा कि नवम अध्याय के इन प्रारम्भिक श्लोकों में ज्ञान, विज्ञान, श्रद्धा, भक्ति और परमात्मा की सर्वव्यापकता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। **भक्ति मनुष्य के हृदय को निर्मल करती है और निर्मल हृदय में ही सच्चे प्रेम का उदय होता है।** इसलिए भक्ति केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन को परमात्मा से जोड़ने वाली अनुभूति है।
## हिंडोला उत्सव में आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन
इस अवसर पर **पूरण बैराठी पीठाधीश्वर स्वामी श्री राम सेवक दास जी महाराज** ने बताया कि श्रावण की हरियाली तीज के अवसर पर मंदिर परिसर में **हिंडोला उत्सव** का आयोजन किया जा रहा है। उत्सव के प्रथम दिवस भगवान को झूला झुलाने की परम्परा के साथ अपराह्न 3 से 6 बजे तक गीता की व्याख्या तथा रात्रि 7 बजे से **रासलीला** का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि धार्मिक अनुष्ठान, गीता स्वाध्याय और सांस्कृतिक कार्यक्रम भारतीय सनातन परम्परा को जन-जन तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम हैं।
कार्यक्रम में स्वागत एवं व्यवस्थाओं में **श्री अलकेश त्रिपाठी, श्री अरुण कुमार शर्मा, श्री कालीचरण शर्मा, श्री अभिषेक द्विवेदी, श्रीमती स्मिता तिवारी, श्री भोले राम** सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
**विश्वगीताप्रतिष्ठानम्, ग्वालियरम्** द्वारा आयोजित यह गीता ज्ञान यज्ञ तीन दिनों तक चलेगा, जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय **राजविद्याराजगुह्य योग** के शेष श्लोकों का क्रमशः स्वाध्याय, व्याख्या और जीवनोपयोगी संदर्भों के साथ विवेचन किया जाएगा।