चेम्बर चुनाव से ठीक पहले महफ़िलों का सजना, जाम का छलकना और पानी की तरह पैसा बहाया जाना—यह अचानक जागी दिलदारी दिमाग में कई बड़े सवाल खड़े करती है। हम सभी को ठंडे दिमाग से सोचना होगा कि जो लोग चुनाव से पहले इस कदर मेहरबान हैं, चुनाव के बाद उनका क्या? तब वे कहाँ चले जाते हैं? आख़िर चेम्बर की इस सीट में ऐसा क्या राज़ छिपा है कि इसे पाने के लिए पानी की तरह दौलत बहाई जा रही है? यह कोई समाज-सेवा का जज़्बा नहीं, बल्कि पावर, प्रेस्टिज और एडमिनिस्ट्रेशन पर अपना असर-ओ-रसूख कायम करने का एक रास्ता है। यह आज का बेहिसाब ख़र्चा असल में कल के बड़े फायदों के लिए किया गया एक बिज़नेस इन्वेस्टमेंट है।
दोगली राजनीति की हद तो देखिए — जो लोग खुद को बनिया, जैन कहते हुये अघाते नहीं हैं, आज उनके यहाँ सरेआम मीट और दारू परोसी जा रही है। नैतिकता के बड़े-बड़े ठेकेदार बने बैठे इस शहर के मठाधीश आज इन शर्मनाक पार्टियों पर पूरी तरह खामोश हैं। जो लोग अपनी ज़िंदगी में कभी खुद की बर्थडे या एनिवर्सरी तक ढंग से नहीं मनाते, उन्हें अचानक क्या हुआ कि आज हर शाम उनकी तरफ से ऐसी शानदार पार्टियाँ दी जा रही हैं? छोटे व्यापारियों को चुनाव में आगे लाने की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ये नेता आज यह नहीं बताते कि एक छोटा और ईमानदार व्यापारी भला इस भारी-भरकम खर्चे के बीच संस्था का नेतृत्व कैसे करेगा? क्या वे यह समझते हैं कि देश और शहर का व्यापारी बिकाऊ है? क्या एक शाम की दावत, थोड़े से नशे और खातिरदारी से एक व्यापारी का ईमान खरीदा जा सकता है? यह व्यापारी समाज का घोर अपमान है। व्यापारी बिकाऊ नहीं है, वह दोस्ती और धंधे का फ़र्क बखूबी समझता है।सबसे बड़ी सोचने वाली बात तो यह है कि लाखों-करोड़ों रुपए बहाकर जो यह अय्याशियाँ चल रही हैं, क्या कल को इनका हिसाब आपसे ही वसूल नहीं किया जाएगा? जिनकी खुद की हर शाम पौए और ताश के पत्तों के बीच बीतती हो, वे व्यापारियों का क्या भविष्य सुधारेंगे? आप उनसे अपनी गंभीर समस्याओं पर क्या बात करेंगे? कल को जब व्यापारियों पर कोई मुसीबत आएगी, जब एडमिनिस्ट्रेशन या सरकार के सामने खड़े होने की बारी आएगी, तब यही लोग आपको बोतल का ख़र्चा गिनवाने लगेंगे। ये पीठ पीछे यही कहेंगे—“चुनाव में दारू पिलाई थी ना, अब काम भी हम ही करेंगे? इसी काम के लिए अध्यक्ष बने हैं क्या?” अपने निजी फायदों और साख को बचाने के लिए, ये बड़े लोग आम व्यापारियों को ही बलि का बकरा बना देंगे।हमें यह हमेशा याद रखना होगा कि जो लोग बड़े-बड़े काँच के महलों में रहते हैं, वे आम व्यापारी के लिए कभी पत्थर नहीं उठाएंगे। उन्हें हमेशा अपने महलों के टूटने का डर रहता है। अब वक़्त आ गया है कि व्यापारी समाज इस दिखावे, नशे और अचानक जागी दिलदारी के पीछे के कड़वे सच को पहचाने। दावत अपनी जगह है, पर वोट देते वक़्त सिर्फ और सिर्फ ईमानदारी, हक़ और व्यापारियों के सच्चे हित को ही चुना जाना चाहिए।