आलीराजपुर की कलेक्टर मां : सख्ती नहीं, अपनत्व से जीत रहीं दिल


(राजेश जयंत)
आलीराजपुर जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले में जहां प्रशासन और आमजन के बीच अक्सर एक दूरी महसूस की जाती है, वहां कलेक्टर नीतू माथुर ने अपने व्यवहार से उस दूरी को कम करने का काम किया है। प्रशासनिक सख्ती और संवेदनशीलता का संतुलन शायद ऐसा ही होता है, जहां पद का रौब नहीं बल्कि अपनापन लोगों के दिलों तक पहुंचता है।
जिला कलेक्टर जैसा बड़ा पद अक्सर व्यक्ति के व्यक्तित्व में औपचारिकता और कठोरता ले आता है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि जिम्मेदारियां बड़ी होती हैं, निर्णय कठिन होते हैं और हर कदम पर अनुशासन बनाए रखना पड़ता है। किंतु आलीराजपुर कलेक्टर नीतू माथुर इस धारणा का अपवाद नजर आती हैं। उनके बोलने का तरीका, लोगों को समझाने की शैली और हर परिस्थिति में संयमित व्यवहार ऐसा महसूस कराता है मानो कोई बड़ी बहन या मां अपने बच्चों को धैर्य और स्नेह से समझा रही हो।
जब भी उन्हें कहीं बोलते हुए सुनने का अवसर मिलता है तो झाबुआ जिले की पूर्व कलेक्टर जयश्री कियावत की याद स्वतः ताजा हो जाती है। वही सहज मुस्कान, वही धीमा और सलीकेदार संवाद, वही आत्मीयता से भरा व्यवहार। प्रशासनिक कुर्सी पर बैठा व्यक्ति जब संवेदनशीलता के साथ लोगों से जुड़ता है, तब उसका प्रभाव आदेशों से कहीं अधिक गहरा होता है। नीतू माथुर अपने मातहत अधिकारियों और कर्मचारियों से भी इसी सहजता के साथ काम लेती हैं। शायद यही कारण है कि उनके कार्यकाल में केवल आदेश नहीं चलते बल्कि संवाद भी चलता है। लोग केवल डर से नहीं बल्कि सम्मान और अपनत्व के भाव से जुड़ते हैं।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण तब देखने को मिला जब हॉस्टल के बच्चे वार्डन और स्टाफ से नाराज होकर सड़क पर उतर आए थे। स्थिति बिगड़ सकती थी, आक्रोश उग्र रूप ले सकता था, लेकिन उस समय नीतू माथुर ने जिस धैर्य और मातृत्व भाव से बच्चों को समझाया, उसने पूरे माहौल को बदल दिया। उन्होंने बच्चों की बातें सुनीं, उन्हें भरोसा दिया और यहां तक कहा कि किसी भी परेशानी में सीधे उनसे संपर्क करें। यह केवल औपचारिक आश्वासन नहीं था, बल्कि बच्चों ने उस अपनत्व को महसूस भी किया। शायद यही वजह रही कि बाद में ऐसी स्थिति दोबारा निर्मित नहीं हुई। व्यवस्था भी सुधरी और बच्चों ने भी महसूस किया कि उनकी “कलेक्टर मां” का दिल दुखाना उचित नहीं  है।
ऐसी ही एक तस्वीर तब सामने आई जब उन्होंने ओवरलोड वाहन को रोककर उसमें बैठे ग्रामीणों और चालक को समझाया। प्रशासनिक कार्रवाई करना आसान था, डांटना भी आसान था, लेकिन उन्होंने समझाइश का रास्ता चुना। यही कारण रहा कि ग्रामीण भी पूरी शालीनता और गंभीरता के साथ उनकी बात सुनते रहे। यदि कोई दूसरा अधिकारी होता तो संभवतः लोग डरकर वहां से हट जाते, लेकिन यहां लोग रुके क्योंकि सामने केवल अधिकारी नहीं बल्कि चिंता करने वाला संवेदनशील व्यक्तित्व खड़ा था।
रात्रि चौपालों में भी उनका यही मानवीय चेहरा दिखाई देता है। गांवों में जाकर देर रात तक ग्रामीणों की समस्याएं सुनना, उन्हें समझना और अधिकारियों को समय सीमा में समाधान के निर्देश देना केवल प्रशासनिक कार्यवाही नहीं बल्कि भरोसे का निर्माण है। ग्रामीणों को यह महसूस होना कि “कोई हमारी सुनने वाला भी है”, अपने आप में बहुत बड़ी बात होती है। कई ग्रामीणों के चेहरे पर वह संतोष साफ दिखाई देता है जैसे स्कूल में अपनी पसंदीदा मैडम से मुलाकात हो गई हो।
सच तो यह है कि कई बार परेशान और थके हुए व्यक्ति को समाधान से पहले संवेदना की जरूरत होती है। सुकून भरे मीठे दो बोल उसके भीतर उम्मीद जगा देते हैं। अलीराजपुर में नीतू माथुर का व्यक्तित्व शायद इसी वजह से अलग पहचान बनाता है। उनके भीतर प्रशासनिक क्षमता के साथ एक मातृत्व भाव भी दिखाई देता है, जो आमजन को सहज रूप से अपनी ओर आकर्षित करता है।
यही कारण है कि जिले का ग्रामीण, आम नागरिक ही नहीं बल्कि प्रशासनिक अमला भी उनके व्यवहार, दरियादिली और मीठे स्वभाव का कायल नजर आता है। आज के दौर में जब प्रशासनिक पदों पर संवेदनशीलता कम होती दिखाई देती है, तब नीतू माथुर जैसी अधिकारी यह भरोसा जगाती हैं कि व्यवस्था में अपनापन, संवेदना और मातृत्व भाव अब भी जिंदा है।

कलेक्टर नीतू माथुर का संदेश
"मातृ दिवस मां के प्रेम और त्याग को नमन करने के साथ-साथ उनके आर्थिक सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता के संकल्प का भी अवसर है। आज आवश्यकता है कि माताओं को केवल सम्मान ही नहीं, बल्कि वित्तीय रूप से स्वतंत्र और आर्थिक रूप से सुरक्षित बनाने की दिशा में भी समाज आगे बढ़े। शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वरोजगार और परिवार के सहयोग से ही महिलाओं का सशक्त एवं आत्मविश्वासी भविष्य तैयार होगा। आलीराजपुर जिला प्रशासन जिले की प्रत्येक महिला और मां के सम्मान, सुरक्षा एवं आत्मनिर्भरता के लिए निरंतर प्रतिबद्ध है।"

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