काम क्रोध और अहंकार पर विजय ही कर्मयोग का रहस्य है - डॉ. तिवारी
ग्वालियर। धर्म, अध्यात्म एवं भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से आयोजित पंच दिवसीय “गीता ज्ञान यज्ञ (कर्मयोग का तत्त्व)” के तृतीय दिवस पर श्रद्धा, भक्ति एवं ज्ञान का अद्भुत संगम देखने को मिला। गंगा दास की बड़ी शाला, लक्ष्मी बाई कॉलोनी, पड़ाव, लश्कर, ग्वालियर में पूरण बैराठी पीठाधीश्वर स्वामी श्री राम सेवक दास जी महाराज हैं, जिनके मार्गदर्शन एवं संरक्षण में यह आध्यात्मिक महायज्ञ सम्पन्न हो रहा है।आयोजित इस आध्यात्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, गीता प्रेमी, युवा, महिलाएँ एवं वरिष्ठजन उपस्थित होकर श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य संदेश का श्रवण कर रहे हैं।
तृतीय दिवस की व्याख्यानमाला में कथा व्यास डॉ. विष्णु नारायण तिवारी, गीता मनीषी एवं केन्द्रीय महामन्त्री, विश्वगीताप्रतिष्ठानम् ने “कर्मयोग में बाधक काम, क्रोध और अहंकार” विषय पर अत्यंत प्रभावशाली एवं गहन व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों का संदर्भ देते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में जितने भी दुःख, अशांति, तनाव, संघर्ष और भ्रम उत्पन्न होते हैं, उनके मूल में कामना, क्रोध और अहंकार ही प्रमुख कारण हैं।
डॉ. तिवारी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन को उपदेश देते हुए स्पष्ट कहा है कि काम और क्रोध मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं, जो उसकी बुद्धि और विवेक को नष्ट कर देते हैं। जब मनुष्य अपनी इच्छाओं की पूर्ति में अत्यधिक आसक्त हो जाता है और उसकी कामनाएँ पूर्ण नहीं होतीं, तब क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से विवेक नष्ट होता है और विवेक के अभाव में मनुष्य अधर्म एवं पतन की ओर बढ़ने लगता है।
उन्होंने कहा कि आज का समाज भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ में आत्मिक शांति से दूर होता जा रहा है। व्यक्ति बाहरी उपलब्धियों में सुख खोज रहा है, जबकि वास्तविक आनंद आत्मसंयम, सेवा और ईश्वर समर्पण में निहित है। गीता का कर्मयोग मनुष्य को यही शिक्षा देता है कि वह बिना फल की इच्छा के अपने कर्तव्य का पालन करे और अपने प्रत्येक कर्म को भगवान के चरणों में अर्पित करे।
अपने ओजस्वी उद्बोधन में डॉ. तिवारी ने कहा कि अहंकार मनुष्य और भगवान के बीच सबसे बड़ी दीवार है। जब व्यक्ति स्वयं को ही सब कुछ मानने लगता है, तब उसके भीतर विनम्रता समाप्त हो जाती है। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति के जीवन में नम्रता, सेवा और समर्पण का भाव होता है, वही वास्तविक कर्मयोगी कहलाता है। गीता मनुष्य को ‘मैं’ और ‘मेरा’ की भावना से ऊपर उठकर ‘सबमें भगवान’ देखने की प्रेरणा देती है।
उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से आह्वान करते हुए कहा कि परिवार, समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर छिपे क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और अहंकार को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करे। सत्संग, स्वाध्याय, साधना और सेवा के माध्यम से ही मनुष्य अपने जीवन को दिव्यता की ओर अग्रसर कर सकता है।
कार्यक्रम के दौरान संपूर्ण वातावरण गीता श्लोकों, भजनों एवं आध्यात्मिक चिंतन से भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने अत्यंत भावविभोर होकर गीता संदेश का श्रवण किया। अनेक श्रद्धालुओं ने कहा कि गीता के व्यावहारिक संदेश आज के तनावपूर्ण जीवन में मानसिक शांति और सकारात्मक दिशा प्रदान करते हैं।
यह पंच दिवसीय “गीता ज्ञान यज्ञ (कर्मयोग का तत्त्व)” ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी शनिवार से एकादशी बुधवार, विक्रम संवत् 2083 के अंतर्गत 9 मई से 13 मई 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। प्रतिदिन सायंकाल 4 बजे से 7 बजे तक गीता स्वाध्याय एवं प्रवचन का आयोजन हो रहा है, जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न अध्यायों एवं कर्मयोग के गूढ़ तत्त्वों का सरल एवं व्यावहारिक विवेचन किया जा रहा है।
आयोजन के आगामी क्रम में 13 मई को अखण्ड गीता पाठ एवं विशेष प्रवचन आयोजित किए जाएंगे। वहीं 14 मई को जिला कार्यशाला, हवन, पूर्णाहुति का आयोजन किया जाएगा, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के सम्मिलित होने की संभावना है।
इस आयोजन कार्यक्रम में श्रीमती रत्ना कपूर, राधा त्रिपाठी, सीताराम शर्मा, ब्रजकिशोर दुबे, कालीचरण शर्मा, इंजीनियर एस.के. गुप्ता, नरेंद्र कुमार सांवला सहित अनेक गणमान्य नागरिक, समाजसेवी एवं धर्मप्रेमी उपस्थित रहे।
विश्वगीताप्रतिष्ठानम्, ग्वालियर के जिला संयोजक अभिषेक द्विवेदी ने समस्त नागरिकों एवं श्रद्धालुओं से सपरिवार उपस्थित होकर गीता ज्ञान यज्ञ का लाभ लेने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन को श्रेष्ठ बनाने वाला सार्वकालिक जीवन-दर्शन है, जो प्रत्येक व्यक्ति को कर्तव्य, संयम और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाती है।