धर्म को बचाना सामूहिक कर्तव्य है - शंकराचार्य अमृतानंद देवतीर्थ
कश्मीर - वर्तमान समय में कुछ देशों के बीच चल रहे युद्धों से उत्पन्न खतरे के कारण विश्व के कई देशों के प्रभावित होने की आशंका बढ़ती ही जा रही है । भारत भी इससे संभवतः अछूता नहीं रह पाएगा । ऐसे संकट के समय में भारत को अपने गौरवमय सनातन धर्म पर दृढ़ता से टिके रहने की अत्यंत आवश्यकता है लेकिन इसके लिए सभी को पहले यह जानने की जरूरत है कि वास्तव में सनातन क्या है और इसके सिद्धांत एवं नियम क्या हैं । इस विषय में हमारी विशेष संवाददाता वंदना विश्वकर्मा ने शारदा सर्वज्ञपीठ, कश्मीर के शंकराचार्य परम आदरणीय स्वामी अमृतानंद देवतीर्थ से विस्तारपूर्वक चर्चा की । उन्होंने इस विषय पर अपना एक वक्तव्य दिया है , जो आपके सामने प्रस्तुत है ।
धर्म तो शाश्वत है । सनातन शब्द का मतलब ही है, जो कभी नष्ट नहीं होता लेकिन सनातन के अनुयायी , उसके मंदिर, तीर्थ और उसकी ज्ञान -परंपरा आज घोर संकट में है। यह दुख की बात नहीं बल्कि चेतावनी है।
अब सवाल यह उठता है कि मठ और मंदिरों का नियंत्रण कौन करे? तो न
सरकार, न नेता, न राजनीतिक चाटुकारों का इन पर नियंत्रण होना चाहिए बल्कि सदाचारी, जितेंद्रिय, सत्यनिष्ठ, संतोषी , शास्त्रज्ञ, निस्वार्थ और समाज के प्रति करुणावान शास्त्रसम्मत आचार्यों को मन्दिरों - मठों को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए ।
सबसे महत्वपूर्ण आचार्य पद ब्राह्मण के हाथ में है क्योंकि ब्राह्मण ज्ञान के संरक्षक और प्रसारक हैं।
ये कोई कुर्सी बचाने का खेल नहीं, ये शास्त्र की आज्ञा है। कुछ महान ज्ञानी जन्मना शूद्र थे, कुछ भील और कुछ वैश्य थे । वे भक्त और ज्ञानी अवश्य थे लेकिन उन्होंने कभी खुद को ब्राह्मण नहीं कहा और न ही मठाधीश बनने का दावा किया । उन्होंने स्वधर्म निभाया और समाज को ज्ञान दिया ।
गीता के 18वें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट कहते हैं , "अपने जन्म की जाति के सहज कर्म को निभाते हुए ही मनुष्य भगवान की आराधना करता है। ग्वाला गाय पाले, स्वर्णकार सोना गढ़े और ब्राह्मण ध्यान संभाले।" यही व्यवस्था समाज को मजबूत बनाती है। पुनर्जन्म के सिद्धांत से शूद्र भी स्वधर्म निभाकर वैश्य, क्षत्रिय, फिर ब्राह्मण योनि तक ऊँचा उठ सकता है। जो ब्राह्मण मदिरा पीता है, राजनीति का गुलाम बनता है या शास्त्र के विरुद्ध बोलता है, हम ऐसे भ्रष्ट ब्राह्मणों की निन्दा करते हैं।
आज सबसे बड़ा खतरा नकली धर्म गुरुओं और धर्माचार्यों से है । नेताओं के पैसों और मीडिया के सहारे कुछ लोग बिना शास्त्र पढ़े महामंडलेश्वर या संत बनकर अधर्म को धर्म बता रहे हैं। कुछ अखाड़ों के भगवाधारी नेता गुलाम बनकर मठों को राजनीतिक कार्यालय बना चुके हैं। सच्चा संत राजनीति का गुलाम नहीं होता।
हमारा पांच सूत्री संकल्प है -
एक- सच्चे आचार्यों को मठ - मंदिर सौंपें, जो शास्त्र जानते हों, स्वतंत्र हों और करुणामय हों ।
दो - सरकारी हस्तक्षेप का पुरजोर विरोध करें, मंदिर रेवन्यू मॉडल नहीं बनने चाहिए।
तीन - हर घर में शुद्ध शास्त्र पाठ शुरू करें, नेता प्रायोजित धर्म नहीं, असली धर्म।
चार - . सभी वर्ण अपना अपना स्वधर्म निभाएं, कोई किसी को छोटा न समझें।
पांच - काश्मीर की शारदा पीठ याद रखें, जहां आज भी सनातन की ज्योति जल रही है।