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बांसुरी की तरह मन निर्मल होना चाहिए: पंडित अग्निहोत्री

ग्वालियर ।  तानसेन नगर के समीप रमटापुरा स्थित सहयोग गार्डन में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन मथुरा वृन्दावन धाम से पधारे  कथावाचक पंडित शुभम अग्निहोत्री  ने भगवान श्रीकृष्ण की अनेक प्रसंगों का श्रवण कराया। भगवान श्रीकृष्ण का बंशी ( बांसुरी) से इतना अधिक लगाव क्यों था? मालूम है आप लोगों को? शायद आपको नहीं मालूम होगा। मैं बताता हूं आपको। कैसे बनती है बांसुरी? किन किन प्रकि्यायों से गुजरना पड़ता है?बंशी किसकी बनी होती है? बांस की और जिस बांस की बंशी बनी होती है वो बांस निरन्तर वर्षांत में पानी से भीगता रहता है, सर्दियों में ठंड से ठिठुरता रहता है और गर्मियों में गर्मी से झुलसता रहता है और इस तरह न जाने कितनी बार गर्मी, वर्षा, सर्दी आती हैं जाती हैं परन्तु वो बांस इन सबको सहन करता रहता है। एक दिन उस बांस को काट दिया जाता है, उसके छोटे-छोटे टुकड़े कर दिए जाते हैं, उसके अंदर जो भी गंदगी भरी होती है उसको सब बाहर निकाल दिया जाता है अर्थात अन्दर से बिल्कुल खाली कर दिया जाता है। फिर उस बांस के ऊपर गर्म लोहे की सलाह से उसे जलाकर उसमें सात छिद्रों ( सूराखों) को बनाया जाता है। इतना त्याग करने के बाद और कष्ट सहन करने के बाद कहीं जाकर बांसुरी बनती है। उसके बाद उसमें सुरीले स्वर निकलते हैं।किसी ,किसी वंशी में 8 और 11 छिद्र भी होते हैं। इतना कष्ट जिसने सहन किया हो, इतना त्याग जिसने किया हो तो फिर क्या वो गोविन्द का प्यारा नहीं होगा? यही कारण था कि गोविन्द वंशी को हमेशा अपने साथ रखते थे,कभी हाथ में, कभी अपने अधरों पर,कभी अपने कमर के फेंट में उसे खुरश लेते थे, यहां तक कि सोते समय भी वह अपने सिरहाने के पास ही वंशी को रखते थे। वंशी के विषय में यदि विस्तार में बोला जाए तो पूरे दो दिन लग जाएंगे। यदि वंशी की तरह हम सब भी अन्दर से अवगुण रूपी गंदगी को निकाल कर मन  निर्मल हो जाएं तो निश्चित रूप से हम सब भी प्रभु के प्रिय हो जाएंगे ।

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