पीएमश्री व सीएम राइज स्कूलों की खामियां गिना रहे शिक्षक
सरकारी योजनाएं शिक्षकों के लिए बन रही सिरदर्द
ग्वालियर. प्रदेश में सरकारी योजनाओं को चलाना अब शिक्षकों की नियति बन गई है। इसका जीता जागता उदाहरण प्रदेश में चल रहे सरकारी स्कूल हैं। इन स्कूलों में कुछ तो पुराने हो चुके स्कूल हैं जिनकी ओर सरकार ध्यान ही नहीं दे रही। कुछ पीएमश्री तो कुछ सीएम राइज स्कूल हैं। इन स्कूलों की बदतर स्थिति किसी से छिपी नहीं है। सच्चाई ये है कि इन स्कूलों में शैक्षिक स्तर जिस कदर बिगड़ा हुआ है कि अब शिक्षक सरेआम खामियां गिनाने लगे हैं।
ग्वालियर में जिन स्कूलों पर बच्चों को शैक्षिक तौर पर मजबूत करने की जिम्मेदारी है उन स्कूलों में शिक्षकों की कमी सारे इंतजामों को ध्वस्त किए हुए है। जिले में दो बड़े स्कूल है जहां बेटियों को शिक्षित करने का शासन स्तर पर बीड़ा उठाया हुआ है। मगर शिक्षा देने वाले शिक्षक ही नहीं है। लश्कर में चलने वाला गजराराजा कन्या विद्यालय में करीब 18सौ छात्राएं हैं जबकि मुरार स्थित कन्या विद्यालय में भी छात्राओं की संख्या लगभग 1800 के करीब है। इन छात्राओं को बैठने के लिए भी क्लास रूम कम पड़ रहे हैं। एक कक्षा में 50 से ज्यादा छात्राएं बैठ रही हैं।
सरकारी स्कूलों में अध्यापन करने वाले शिक्षक भी अब कहते थक नहीं रहे हैं कि उन्हें जो काम करना चाहिए वह नहीं कर पा रहे। सरकार की नीतियां ही ऐसी हैं कि उन्हें शासन की योजनाएं संचालित करना पहले जरूरी है। चाहे एसआईआर या जनगणना कार्य पहले इन कायॉ को सफलतापूर्वक होना चाहिए। सरकारी स्कूलों में आज भी कई स्कूल ऐसे हैं, जहां तक पहुंचने के लिए रास्ते भी जर्जर हैं और इमारतें भी जीर्ण-शीर्ण है।
नियम बना अध्यापन में बाधक
शासन का नियम भी सांदीपनी स्कूल के शैक्षिक कार्य में बाधक बना हुआ है। शिक्षकों का कहना है कि शासन ने बेहतर शिक्षा के लिए प्रदेश भर के सांदीपनी स्कूलों में शिक्षकों की आयु 50 वर्ष तय कर दी है। इसके चलते अधिक आयु के शिक्षक भी सांदीपनी स्कूल में अध्यापन नहीं करा पा रहे हैं। जबकि कई शिक्षक सांदीपनि स्कूल में बेहतर शिक्षा देने के लिए तैयार हैं मगर शासन की मंशा है कि इन स्कूलों के शैक्षिक स्तर को बेहतर बनाने के लिए शिक्षकों की आयु 50 वर्ष से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।