श्री गुरु पूर्णिमा विशेष: राजा दशरथ जी की अनुपम गुरु-भक्ति: दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी
श्री गुरु पूर्णिमा विशेष: गुरु पूजा आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करने वाले पूर्ण गुरु के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का पवित्र पर्व है, आईए श्री गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर गुरु-भक्ति की लौ को प्रचण्ड करते हुए एक सच्चे गुरु-भक्त बन जाएँ
दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी
(संस्थापक एवं संचालक, दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान)
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा- गुरु पूजा का परम पुनीत पर्व। आज का दिन तो उनका दिन है, जिन्होंने इस जीवन को पूर्णता प्रदान की। आज तो उनका दिन है, जिन्होंने तन-मन और समूचा जीवन भक्ति के मजीठ रंग में रंग दिया। नि:सन्देह ऐसे ही अलौकिक आनन्द से वेद व्यास जी के शिष्य भी कृतार्थ हुए होंगे। तभी तो उन्होंने इस कृतार्थता को अभिव्यक्त करने के लिए 'गुरु पूजा' की परम्परा का शुभारम्भ किया।
शताब्दियों पूर्व, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को महर्षि वेद व्यास जी का अवतरण हुआ था। वही वेद व्यास जी, जिन्होंने वैदिक ऋचाओं का संकलन कर चार वेदों के रूप में वर्गीकरण किया था। 18 पुराणों, 18 उप-पुराणों, उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र, महाभारत आदि अतुलनीय ग्रंथों को लेखनीबद्ध करने का श्रेय भी इन्हें ही जाता है।
ऐसे महान गुरुदेव के ज्ञान-सूर्य की रश्मियों में जिन शिष्यों ने स्नान किया, वे अपने गुरुदेव का पूजन किए बिना न रह सके। इसलिए शिष्यों ने उनके अवतरण के मंगलमय एवं पुण्यमयी दिवस को पूजन का दिन चुना। यही कारण है कि गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। तब से लेकर आज तक हर शिष्य अपने गुरुदेव का पूजन-वंदन इसी शुभ दिवस पर करता है।
त्रेता-द्वापर में ऐसे अनन्य गुरु-भक्त हुए, जिनकी सुगन्धि से आज भी इतिहास सुरभित हो रहा है... रामायण, जिसे हम श्री राम की कथा का आधार कहते हैं, वो तो गुरु-भक्तों की कथाओं से भरी हुई है। ठीक से विश्लेषण करें, तो स्वयं महाराज दशरथ एक उत्तमकोटि के गुरु-भक्त हुए हैं। यह उनकी गुरु-भक्ति का ही तो प्रताप था, जिसने स्वयं भगवान को भी उनका पुत्र बनने को विवश कर दिया।
महाराज दशरथ के पास सब कुछ है, लेकिन पुत्र-रत्न नहीं है। एक दिन यह ग्लानि उन्हें इतना पीड़ित करती है कि वे स्वयं को रोक नहीं पाते। ऐसे समय में उन्हें याद आती है, अपने गुरु वशिष्ठ जी की। इसलिए वे सीधे अग्रसर होते हैं, आश्रम की ओर। जब महाराज दशरथ ने अपना दु:ख गुरु वशिष्ठ को सुनाया, तो गुरु ने एक नहीं चार-चार पुत्र होने का वर दे दिया। और फिर, पुत्र रूप में पाया भी तो किसे? स्वयं जगतनियन्ता भगवान को! यही तो है गुरु का सामर्थ्य! वो रीझ जाएँ, तो भगवान को भी सहजता से झोली में डाल दें। इसलिए ऐसे सर्वसामर्थ्यवान गुरु को छोड़कर कौन है जो हमें कुछ दे सकता है? मूढ़ होते हैं वो लोग, जो ऐसे गुरु को तजकर इधर-उधर पीरों-फकीरों के दर पर माथे रगड़ते हैं।
ऐसा नहीं है कि दशरथ जी को गुरु की याद तभी आई जब उनके जीवन में दु:ख का अंधेरा व्याप्त था। जैसे ही खुशियों की पौ फटी, तब भी सबसे पहले उन्हें अपने गुरु का स्मरण हो आया। जैसे ही उन्हें पुत्रों के जन्म का समाचार मिला, तो सबसे पहले गुरु वसिष्ठ जी को ही बुलाया गया और पुत्रों का पहला मुखदर्शन भी उन्हें ही कराया गया। उसके बाद ही अन्य सगे-सम्बन्धियों को सूचित किया गया।
यह है आदर्श गुरु-भक्त, जो केवल दु:ख में ही नहीं अपितु सुख में भी अपने गुरु को प्रथम स्थान देता है। यही नहीं, जब श्री राम के नामकरण का समय आया, तब भी महाराज दशरथ ने यह नहीं सोचा कि पुत्र प्राप्ति तो मेरा एक स्वप्न था। इसलिए अपने पुत्रों के नाम मैं स्वयं अपनी इच्छा से रखूँ। अपितु यहाँ भी गुरु-भक्त दशरथ ने अपने गुरु को ही यह अधिकार दिया। दशरथ जब तक जीए, उनका हृदय सदा गुरु-प्रेम से सराबोर रहा। इसीलिए तो गोस्वामी जी को उनके विषय में कहना पड़ा- आजीवन दशरथ जी ने गुरु चरणों की ही पूजा की और हृदय में गुरु-प्रेम को ही स्थान दिया। गोस्वामी जी अपनी वाणी में लिखते हैं - जो गुरु चरणों की रज को अपने शीश पर धारण करते हैं, वे संसार व अध्यात्म जगत के सब ऐश्वर्य वश में कर लेते हैं। यह मेरे जीवन का अनुभव है कि गुरु चरणों की पावन रज पाकर सब कुछ पाया जा सकता है।
अत: साधकों, हम भी अपनी गुरु-भक्ति की लौ को प्रचण्ड कर एक सच्चे गुरु-भक्त बन जाएँ; और अपने राम को प्राप्त कर जीवन सफल कर जाएँ। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से सभी पाठकों को श्री गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ।