तलवार उठाकर फिरंगियों को खदेड़ने वाली शेरनी लक्ष्मीबाई को पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी-भा क पा
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी*
ग्वालियर । भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जिला ग्वालियर के साथियों ने शहीद वीरांगना लक्ष्मीबाई के शहादत दिवस के अवसर पर फूलबाग ग्वालियर स्थित लक्ष्मीबाई समाधि स्थल पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।
भा क पा राज्य कार्यकारिणी सदस्य कॉमरेड कौशल शर्मा एडवोकेट ने विज्ञप्ति जारी कर बताया कि रानी लक्ष्मीबाई झांसी की वह रणबांकुरी थी जिसने अपने छोटे से राज्य के लिए ही नहीं बल्कि पूरे हिंदुस्तान की प्रतिष्ठा के लिए अंग्रेजो से अंतिम सांस तक युद्ध किया। सन 1928 में काशी (वाराणसी) में जन्मी लक्ष्मीबाई का बचपन अद्भुत था। घुड़सवारी तलवारबाजी और धनुर्विद्या यह उनके सामान्य खेल थे। वह कई लड़कों से अधिक तेज और निर्भीक थी बचपन से ही उनके भीतर जन्मजात योद्धा दृष्टि गोचर होता था। कम उम्र में उनका विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव से हुआ और वह रानी लक्ष्मीबाई बनी। विधवा होने के बाद जब अंग्रेजों ने दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी ना मानकर झांसी हड़पने की चाल चली। इसके खिलाफ 1857 में विद्रोह की ज्वाला भड़की और झांसी उसका सबसे उग्र केंद्र बनी।रानी ने सेना सगठित की, महिलाओं को युद्ध कला सिखाई और अंग्रेजों के हर हमले का दृढ़ता से सामना किया। यह उस युद्ध का आरंभ था जहां एक स्त्री ने विशाल साम्राज्य को चुनौती देने का संकल्प लिया। अंग्रेजों ने भारी तोपे तैनात की कई दिनों तक किला डोलता रहा। अंततः दीवारें टूट गई पर झांसी नहीं टूटी। क्योंकि झांसी रानी लक्ष्मीबाई की आत्मा थी और उन्होंने अंतिम क्षण तक लड़ने का निर्णय लिया । लेकिन यह भी समझा कि उनका जीवित रहना आवश्यक है ताकि संघर्ष आगे भी जारी रहे । वे घोड़े पर छलांग लगाकर कालपी के लिए निकल पड़ी। कालपी में रानी ने एक नई सेना बनाई उन्होंने तात्या टोपे के साथ मिलकर अंग्रेजों को कई स्थानों पर कड़ी टक्कर दी फिर रानी का कदम ग्वालियर की ओर बढ़ा जहां उनका अंतिम महान संग्राम अंग्रेजों के साथ हुआ। ग्वालियर की धरती पर उनका संघर्ष और भी उग्र रूप से हुआ ।
रानी न्याय के लिए लड़ी, अधिकारों के लिए खड़ी हुई, भय के बिना अत्याचारों का विरोध किया । 17 जून 1958 को ग्वालियर की रणभूमि पर रानी लक्ष्मीबाई ने युद्ध करते हुए प्राण त्याग दिए। वे युद्ध भूमि में गिरी---- पर गिरा केवल शरीर साहस नहीं। रानी का अंतिम संस्कार उनके सहयोगियों ने कर दिया ताकि दुश्मन उनके पवित्र शारीर को छू भी ना सके। रानी मरी नहीं ----- वह अमर हुई ।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपनी महिला रेजीमेंट का नाम *रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट* रखा।
भगत सिंह अक्सर कहा करते थे *जो साहस झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने दिखाए वही साहस हर भारतीय में होना चाहिए*
*सरोजिनी नायडू उन्हें भारतीय स्त्री शक्ति की अमर प्रतिमा कहती थी*
रानी लक्ष्मी बाई प्रतिमा स्थल पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम के अवसर पर कॉमरेड कौशल शर्मा एडवोकेट, रविंद्र सरवटे एडवोकेट, रतन कुमार वर्मा एडवोकेट, अनवर खान,प्रकाश वर्मा,ज़ालिम सिंह, आनंद ठाकुर, बारे लाल पाल, अब्दुल शहीद,अशोक वर्मा, सौरभ श्रीवास्तव , लॉयर्स यूनियन के शैलेश बोहरे, सुरेश कुमार कुशवाहा,आदि ने बड़ी संख्या में साथियों ने भाग लिया।