चेंबर की हवा बदलेगी और अब बिना हाउस के भी चुनाव लड़ने की हिम्मत जुटायेंगे व्यापारी
माधव अग्रवाल
यह किसी विधायक सांसद की बैठक नहीं थी, किसी को बसें, जीप नहीं भेजी गई कि बैठक में आना है। आने वाली भीड़ को भी पता था कि यह प्रवीण भाईसाहब के चुनाव की बैठक है, तो लजीज व्यंजन भी नहीं मिलेंगे। सब जानते हैं कि डॉ साहब की अपनी अलग सोच रहती है, बहुत गहरी। कई बार वह हाउस की बैठकों में भी विरोध करते नज़र आए कि चैंबर की सीट निस्वार्थ है इसमें पंजीरी नहीं मिलती इसलिए चुनाव को खर्चीला न बनाया जाए। इससे जो भी सेवा या प्रतिष्ठा के लिए चुनाव लड़ने आगे आए खर्च की वजह से पीछे न हटे। बिना एसी हॉल के ही भारी उमस में लोग डटे रहे, पकौड़ी चाय, दही बड़े खा कर किसी ने शिकायत नहीं की कि डोसा, पुलाव क्यों नहीं मिले।
बुलाने के लिए न टीम लगानी पड़ी न डॉ साहब को खुद फोन लगाने पड़े न किसी को ठेका देना पड़ा उन्होंने वही बाजारों का चेन सिस्टम उपयोग किया जो सबसे मजबूत सिस्टम है और जिसे प्रशासन भी कई बार नहीं समझ पाता। चेन सिस्टम में हर बाजारों के प्रमुखों अध्यक्ष सचिवों को फोन कर दिया जाता है और उन्हें अपने अपने क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है। आग की तरह मैसेज पहुंचता है और अपने अध्यक्षों की बात पर सभी व्यापारी काम करते हैं यह बाजारों का प्रोटोकॉल है। पुरानी बात है जब एससीएसटी एक्ट के आंदोलन के लिए मीटिंग बुलाई गई तब सरकार हमें इस कदर रोकना चाहती थी कि हमारी मीटिंग में भी इंटेलिजेंस के लोग सादा कपड़ों में बैठा दिए गए। धारा 144 लगा दी गई, प्रशासन का रवैया इतना सख्त था उन्हें लगता था कि जब कोई निकलेगा ही नहीं झुंड में तो बंद कैसे करवाएंगे। मैं स्वयं भी उस मीटिंग में मौजूद था, तय हुआ कि हर बाजार के लिए खुद उनके मुखिया ही जिम्मेदार होंगे।
चैंबर में सिर्फ डॉ प्रवीण अग्रवाल ही ऐसे हैं जो बाजारों के इस कंट्रोल सिस्टम को जानते हैं, केवल बाजार के मुखियाओं को बुला कर जिम्मेदारी डाल दी गई। बड़ा कड़क मैसेज था कि दुकान से कोई खाता सामान भी निकालना है तो एक दिन पहले निकाल लेना, हड़ताल के दिन कोई चाबी नहीं डालेगा। किसी का शटर भी उचका मिले तो बाजार के मुखिया केवल दो लोगों को भेजेंगे और बात करेंगे। जीवन में वह पहला ऐतिहासिक बंद था न कोई नारा लगा, न जलूस निकला और अब तक का सबसे मुकम्मल बंद।
कहने का मतलब एक ही है कि डॉ साहब बाजारों की नब्ज जानते हैं जमीन से जुड़े हैं। सैंकड़ों असहमति भी उनके प्रति मैंने भी व्यक्त की हैं और व्यापारियों से भी सुनी हैं। लेकिन असहमति का मतलब व्यक्ति का विरोध नहीं इस फर्क को आज के समर्थन से सभी ने समझा। असहमति और नाराज़गी भी लोग उसी से व्यक्त करते हैं जो काम करता है, जो कुछ करता ही नहीं उससे असहमति या गुस्सा दिखा कर हम क्या लेंगे इसलिए कुछ नहीं करने वाले का विरोध भी कम ही होता है। सैंकड़ों व्यापारियों का आज उन्हें समर्थन मिला क्योंकि उनकी कार्यशैली दूसरों से अलग है। आज चुनाव भी लड़ रहे हैं फिर भी जब हमने सराफा की सड़क का मुद्दा उठाया तो उन्होंने उसे गंभीरता से लिया और अपने प्रयासों से अवगत करवाया।
आज की भीड़ में 10% उनके विरोधी भी मौजूद थे कुछ माहौल देखने आए थे और कुछ डॉ साहब को शक्ल दिखाने, पर चुनाव के वक़्त डॉ साहब दस सर से सोचते हैं, किसी भी चुनाव को हल्के में नहीं लेते वह जानते हैं कि काम, जुड़ाव अपनी जगह है चुनाव कभी हल्के में ले कर नहीं लड़ा जाता वह भी तब जब अपना हाउस ही अलग हो। क्रिएटिव के प्रत्याशी नहीं उतारने से भी उनको फायदा मिलेगा, क्रिएटिव अब समर्थन दे या न दे वह हाउस के आधे वोट झटक लेंगे जो कट्टर हैं और दूसरे हाउस को कभी वोट नहीं देंगे। निर्णय शायद पहले से तय था लेकिन उन्होंने बिना रायशुमारी के निर्णय नहीं लिया, दस दिन तक हवा का रुख भांपा, लोगों का मन टटोला और खुद तब तक इंतजार किया जब तक लोगों ने उन्हें धक्का दे कर आगे खड़ा नहीं कर दिया। हवा बता रही है कि अब चैंबर की हवा बदलेगी और आगे भी बिना हाउस के लोग लड़ने की हिम्मत जुटाएंगे।
(लेखक स्वतंत्र विचारक हैं और ग्वालियर के बाजार की नब्ज समझते हैं )