कोली झोरा तालाब ने दिखाई जल संरक्षण की ताकत, सूखे खेतों में लहलहाईं फसलें

(हितेन्द्र सिंह भदौरिया)
ग्वालियर।  जब जल संरक्षण की इच्छाशक्ति, जनभागीदारी व सरकार की दूरदर्शी योजना एक साथ मिलती है तो बंजर जमीन भी सोना उगलने लगती है। ग्वालियर जिले के विकासखंड घाटीगांव की ग्राम पंचायत आरोन में इसका जीवंत उदाहरण मौजूद है। जल गंगा संवर्धन अभियान एवं प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना-वाटरशेड विकास 2.0 के तहत यहां बने "कोली झोरा तालाब" ने यहां के 50 हेक्टेयर बंजरनुमा सूखे क्षेत्र के रकबे को उपजाऊ खेतों में बदल दिया है। अब इन खेतों में गेहूं और सरसों की फसलें लहलहाने लगी हैं। 
ग्राम आरोन की औसत बारिश लगभग 750 एमएम है। पर जल संरक्षण के साधन न होने से सारा पानी बहकर निकल जाता था। बोरवेल भी सफल नहीं होते थे। लगभग दो वर्ष पूर्व गांव से 4 किलोमीटर दूर स्थित कोली झोरा नाले पर लगभग 23.77 लाख रुपये की लागत से तालाब बनाया गया। लगभग 30 से 35 हजार घनमीटर जलभराव क्षमता वाला यह तालाब पहली ही बरसात में लबालब भर गया और सूखे खेतों में जान लौट आई। आरोन निवासी शिवचरण आदिवासी कहते हैं पहले पानी की कमी से जमीन खाली पड़ी रहती थी। अब नियमित खेती हो रही है और फसलें भी अच्छी हो रही हैं। धनीराम बताते हैं अब अपने ही खेत में फसल उगाकर परिवार का अच्छे से पालन-पोषण कर रहे हैं। पहले हमें काम की तलाश में बाहर जाना पड़ता था। हाकिम आदिवासी के अनुसार अब गेहूं-सरसों की खेती के साथ पशुओं को भी वर्षभर पानी मिल रहा है। लोभाराम आदिवासी कहते हैं कि तालाब बनने के बाद कुओं-पोखरों में पूरे साल पानी बना रहता है और भूमिगत जल स्तर में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। कोली झोरा तालाब आज जल संरक्षण का एक सफल मॉडल बनकर उभरा है। इस एक पहल से सूखी पड़ी जमीन उपजाऊ हो गई है। इससे किसानों की आय बढ़ी, भूमिगत जल स्तर सुधरा और गांव में खुशहाली लौटी। यह सफलता बताती है कि सरकार की सोच और जनभागीदारी से जल संरक्षण के छोटे प्रयास भी तस्वीर बदल सकते हैं। कोली झोरा तालाब इसका जीवंत प्रमाण है। 


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