पारस बुरे नहीं थे, लेकिन व्हाईट की इमेज में प्रवीण के साथ हुई साजिश का धब्बा लगा था
- दिग्गज व्हाईट हाउस की हार के कारण जानिये
ग्वालियर। मप्र चेंबर आफ कामर्स एण्ड इंडस्ट्रीज के निर्वाचन हो गये और व्हाईट हाउस की अध्यक्ष पद पर करारी हार भी हो गई। अब आइये इस हार के कारणों में चलते हैं। ऐसा नहीं है कि व्हाईट हाउस के प्रत्याशी पारस जैन कोई बुरे व्यक्ति थे, इसलिये हार गये। पारस जैन निश्चित रूप से एक भले इंसान व यारबाज व्यक्ति हैं, उनकी कभी किसी से जातीय दुश्मनी भी नहीं थी, उनको व्यापारियों का प्यार भी मिला। लेकिन यह प्यार वह व उनके बाहरी समर्थक मतों में तब्दील नहीं करवा सकें। उनकी वैभव व धनबल की चमक में उनके चिपके यूट्यूबर ने उन्हें चेंबर का महानायक व जीता हुआ बताकर उन्हें हाई-फाई बना दिया और वह आम मतदाता तक पहुंच ही नहीं सकें। वहीं चेंबर के असली महानायक डा. प्रवीण अग्रवाल ने जनबल के साथ हर मतदाता तक पहुंचकर, हर मीडिया पर्सन से बात की और अपनी हर कमजोरी को सुधारा और हर दिन चने, मूंगफली और लाई खाकर अपना चुनाव लड़ा। यहीं कारण था कि डा. प्रवीण अग्रवाल दिग्गज व्हाईट हाउस व उसके दिग्गज प्रत्याशी पारस जैन को परास्त कर पाये।
अब असली स्थिति देखिये पारस जैन सहित उनके मित्र मैरिज गार्डन संचालक खंडेलवाल, सोनू मंगल, व्हाईट हाउस के सर्वेसर्वा अरविंद अग्रवाल, डा. वीरेन्द्र गंगवाल, प्रशांत गंगवाल, जीएल भोजवानी,अजय बंसल को दिल्ली - इंदौर से आई चुनावी मैनेजमेंट कंपनियों ने अपने भ्रामक जाल में फंसा लिया, जो उन्हें 100 प्रतिशत चुनाव जीत का सपना दिखाती रही और लाखों रूपये प्लानिंग के ऐंठ भी लिये। जबकि यह प्लानिंग पूरी फेल रही। चेंबर के मतदाता ने रोज व्हाईट हाउस की शराब, कबाब पार्टियों को जमकर भोगा, लेकिन वोट सूखी रोटी वाले आम आदमी डा. प्रवीण अग्रवाल को दिया।
फोनों से भी नाराज हुये लोग
व्हाईट हाउस प्रत्याशी पारस जैन के लिये कुछ प्रभावशाली लोगों के फोन से व्यापारी उस समय तो चुप रहे, हां मैं हा भी करते रहे, लेकिन वोट उनका भविष्य की रणनीति समझते हुये डा. प्रवीण अग्रवाल को गया।
पारस जैन को संयुक्त अध्यक्ष लड़ाते तो सारा पैनल जीतता
चेंबर से जुड़े व्यापारी बंधुओं का कहना है कि यदि डा. प्रवीण अग्रवाल को व्हाईट हाउस अध्यक्ष पद पर रिपीट कर पारस को संयुक्त अध्यक्ष पद पर लड़ाते तो व्हाईट का सारा पैनल जीत जाता। पारस को अगली बार के लिये मना लिया जाता। अब व्हाईट हाउस के कोर ग्रुप के सर्वेसर्वा अरविंद अग्रवाल, डा. वीरेन्द्र गंगवाल व जीएल भोजवानी की वजह से व्हाईट हाउस अध्यक्ष, संयुक्त अध्यक्ष व उपाध्यक्ष जैसी महत्वपूर्ण सीटों से हाथ धो बैठा।
पारस को सपने दिखाते रहे यूट्यूबर
विशेष बात यह है कि पारस ने अपना चुनाव अपने पत्रकार मित्रों से दूर होकर यूट्यूबरों के भरोसे लड़ लिया। यूट्यूबर उन्हें रोज जीत का सपना दिखाकर अपना मतलब निकालते रहे और यह चुनाव इस मैनेजमेंट पर महंगा भी हो गया। जो समाचार पत्र व सोशल मीडिया न्यूज वेबसाइट उनका सही पक्ष प्रस्तुत कर सकती थी, वह उनसे दूर हो गये। इसका उदाहरण संयुक्त अध्यक्ष सुरेश बंसल, उपाध्यक्ष संदीप नारायण अग्रवाल व सचिव दीपक अग्रवाल के साथ देखिये, जो समाचार पत्रों के पत्रकारों व न्यूज वेबसाइटों के सहारे आगे बढ़े और शानदार जीत अर्जित की। यही स्थिति मनोज अग्रवाल बाबा की भी रही।
प्रशांत गंगवाल को अब तीन साल बाद की चिंता
इस बार अध्यक्ष पद के चुनाव लड़ने के इच्छुक प्रशांत गंगवाल को अगली बार लड़ाने का आश्वासन देकर बिठाया गया था। लेकिन व्हाईट हाउस अध्यक्ष प्रत्याशी की स्थिति देखकर अब उन्हें अगले तीन साल बाद चुनाव लड़ने में परिणाम की चिंता सतायेगी। क्योंकि डा. प्रवीण अग्रवाल ने ऐसा रास्ता खोल दिया है कि अब व्हाईट हाउस टूट के मुहाने पर आ जायेगा।
भूपेन्द्र जैन की अपील का भी नुकसान हुआ
पारस जैन के लिये कैट के भूपेन्द्र जैन की अपील का भी भारी नुकसान पारस जैन को उठाना पड़ा। उनके जैन समाज के लोग जो भूपेन्द्र जैन के साथ व्हाईट हाउस की वादाखिलाफी से नाराज थे, वह व्हाईट हाउस प्रत्याशी के खिलाफ वोट देकर आये।
चुनाव के दिन भारी भीड़ से भी बिगड़े पारस के समीकरण
मतदान के दिन पारस जैन के समर्थकों जिसमे बाहरी लोग भी शामिल थे की भीड़, उनके पारस जैन के लिये लगे नारे व टीशर्टों ने भी चुनाव की गणित बिगाड़ा, जबकि स्वतंत्र उम्मीदवार प्रवीण अग्रवाल अकेले क्रियेटिव हाउस के संयुक्त उम्मीदवार सुरेश बंसल के साथ खड़े होकर हाथ जोड़कर खड़े रहे, जिससे मतदाता उनकी दयनीय हालत पर पसीजा भी और वोट भी दिया।
आशीष वैश्य की अपील भी खेल बिगाड़ गई
सीआईआई ग्वालियर जोन के अध्यक्ष आशीष वैश्य द्वारा व्हाईट हाउस प्रत्याशी पारस जैन के पक्ष में की गई अपील भी बेअसर साबित हुई। आशीष वैश्य बदलाव की बात कर डा. प्रवीण अग्रवाल के बारे में कहते रहे कि डा. प्रवीण अग्रवाल ने उद्योग व व्यवसाय के लिये कुछ नहीं किया। जबकि लोगों को याद था कि ग्वालियर में जो दो तीन इन्वेस्टर्स मीट हुई उसमे आशीष वैश्य मंच पर जमे थे और व्यापारियों व उद्योगपतियों की सबसे प्रमुख संस्था मप्र चेंबर आफ कामर्स के पदाधिकारियों को उसमे बुलाया ही नहीं गया था और छोटी मोटी खेरीज हाथ ठेला एसोसिएशन मंच पर बैठे थे तब भी आशीष वैश्य अपने आपका महिमा मंडन करते रहे। इसी कारण ग्वालियर में इण्डस्ट्रीज मीट अपेक्षाकृत सफल नहीं रही, क्योंकि चेंबर आफ कामर्स की उपेक्षा हुई थी। व्यापारी व उद्योगपति आशीष वैश्य की इसी मनमानी से नाराज होकर उनकी अपील के खिलाफ पारस की जगह प्रवीण अग्रवाल को वोट दे आये।