आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में दो दिवसीय ‘आमोत्सव-3‘ का हुआ समापन


- आम की उन्नत किस्में भारत की समृद्ध कृषि एवं सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैंः सच्चिदानंद जोशी

- रटौल आम कि मिठास ऐसी है कि हर कोई इसे अपना बताने लगता है, लेकिन यह आम तो सिर्फ रटौल का ही हैः जुनैद फरीदी

- भारत के आमों की गुणवत्ता, स्वाद और विविधता विश्व में अद्वितीय हैः सोहेल हाशमी

- आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर परिसर में विकसित किया जाएगा आम का बागः फाउंडर चांसलर श्री रमाशंकर सिंह जी

- प्रकृति के उपहारों को मिल-बांटकर खाने से समाज में सकारात्मक ऊर्जा, आत्मीयता और सामाजिक सौहार्द बढ़ता हैः राज भाटिया

- प्रदर्शनीः 200 किस्म के आमों में पहली बार ग्वालियर में नजर आये रटौल आम ने हर किसी को ललचाया

- मेला में आम से बनी खीर, बर्फी, फालूदा सहित विभिन्न व्यजनों सभी को लुभाया, झूला झूलकर लिया आनंद

- छात्रों ने ड्रामा के माध्यम से लोकतंत्र को बचाने का दिया संदेश

ग्वालियर । आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘आमोत्सव-3‘ का द्वितीय दिवस ‘बतरस, कविता, संगीत, चित्रकारी, झूला, व्यंजन और ज्ञान के आम रस में डूबा नजर आया। द्वितीय और अंतिम दिवस के अवसर पर आम पर केंद्रित बहुरंगी-बहुरस उत्सव मेला का आयोजन संस्थान के सिथौली परिसर में किया गया। जिस का उद्घाटन मुख्य अतिथि सच्चिदानंद जोशी (सदस्य सचिव, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली) द्वारा किया गया। वहीं विशिष्ट अतिथि के रूप में रटौल से आए जुनैद फरीदी, सोहेल हाशमी, राज भाटिया (विधायक दिल्ली एवं पूर्व अध्यक्ष, आजादपुर फल मंडी, दिल्ली), राजकुमार जैन, शामिल हुए। इस अवसर पर आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के फाउंडर चांसलर श्री रमाशंकर सिंह जी, प्रो-चांसरल डाॅ. दौलत सिंह चैहान, वाइस चांसलर प्रोफेसर डाॅ. योगेश उपाध्याय, एसओएडी की डीन डाॅ. शमा परवीन, कुलसचिव डाॅ. ओमवीर सिंह, उप-कुलसचिव श्री अनिल माथुर, डाॅ. मनीष जैसल, आईटीएम ग्वालियर की निदेशक डाॅ. मीनाक्षी मजूमदार सहित विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष, डीन, प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।
आम की उन्नत किस्में भारत की समृद्ध कृषि एवं सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैंः सच्चिदानंद जोशी
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘आमोत्सव-3‘ पर द्वितीय और अंतिम दिवस के अवसर पर मेला का शुभारंभ मुख्य अतिथि सच्चिदानंद जोशी (सदस्य सचिव, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली) द्वारा किया गया। इस अवसर पर उन्होंने ‘भारत में आम की विविधता एवं विशिष्ट किस्में‘ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि भारत विश्व का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है और यहां सैकड़ों स्थानीय तथा उन्नत किस्में पाई जाती हैं, जो देश की समृद्ध कृषि एवं सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उन्होंने अपने व्याख्यान में दुर्लभ एवं विशिष्ट आम की किस्मों की पहचान, उनके संरक्षण तथा वाणिज्यिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पारंपरिक एवं स्थानीय किस्में केवल स्वाद और गुणवत्ता की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि उनमें जलवायु परिवर्तन, रोग प्रतिरोधक क्षमता तथा बेहतर उत्पादन जैसी अनेक उपयोगी आनुवंशिक विशेषताएं भी निहित हैं। इन किस्मों का संरक्षण भविष्य की उन्नत प्रजनन (ब्रीडिंग) योजनाओं और टिकाऊ बागवानी के लिए अत्यंत आवश्यक है। सच्चिदानंद जोशी ने इस बात पर भी बल दिया कि भारत की पारंपरिक आम विरासत का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, संरक्षण और व्यापक प्रचार-प्रसार समय की आवश्यकता है, जिससे इन दुर्लभ किस्मों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल सके तथा किसानों को इनके माध्यम से बेहतर आर्थिक अवसर प्राप्त हों।
रटौल आम कि मिठास ऐसी है कि हर कोई इसे अपना बताने लगता है, लेकिन यह आम तो सिर्फ रटौल का ही हैः जुनैद फरीदी
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘आमोत्सव-3‘ में विशिष्ट अतिथि रटौल से आए जुनैद फरीदी ने ‘भारत-पाकिस्तान का एक और विवाद बिंदु-छोटा, मीठा, रसीला, रटौल आम‘ पर अपना व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि रटौल आम का इतिहास करीब 300 साल पुराना है। उन्होंने किस्सा सुनाते हुए बताया कि हमारे परदादा शेखमोहम्मद अफाक फरीदी आम के बहुत शौकीन थे। उन्होंने 1912 का किस्सा बताते हुए कहा कि जब परदादा ने आम का एक छोटा पौधा देखा तो उसको अपने बाग में लगा दिया। उसका संरक्षण किया। जब इस पेड़ से आम निकला तो वह इतना मीठा था कि इस किस्म का दूसरा, तीसरा और अब हजारों पेड़ रटौल में है। उन्होंने बताया कि हमारे परदादा आम के पड़े की पत्तियों को सूंघकर ही बता देते थे कि वह किस किस्म का आम है। उन्होंने रटौल आम से जुड़ा भारत-पाकिस्तान का किस्सा सुनाते हुए बताया कि पाकिस्तान के जिया उल हक मिलिट्री डिक्टेटर ने इंदिरा गांधी जी को रटौल आम की दो पेटियां भिजवाईं और कहा कि यह पाकिस्तानी आम है। इंदिरा जी को आम तो बहुत पसंद आया। जब मीडिया के जरिये यह बात रटौल गांव तक पहुंची तो हमने और ग्रामीणों ने मिलकर इंदिरा जी को बताया कि रटौल तो भारतीय आम है। उन्होंने बताया कि दुबई में आमों को लेकर हुई प्रदर्शनी में भी हमारा रटौल आम मिठास और स्वाद के मामले में अव्वल आया। लेकिन यहां भी पाकिस्तानी इसे अपना बनाकर विवाद खड़ा करने लगे। इसके बाद हमने इस आम के संरक्षण को लेकर दाबे किये और यह दाबे वर्ष 2010 में जीआई मार्का मिलने के साथ ही सत्यता की कठौती पर खरे उतरे। अब यह आम सिर्फ हमारे रिटौल का है। इसलिए इस आम का नाम ही रटौल आम पड़ गया। उन्होंने बताया कि रटौल आम का संरक्षण हमार पीढ़ी दर पीढ़ी कर रही हैं। अब हमारी चैथी पीढ़ी मेरा बेटा उमर फरीदी आमों की नर्सरी बना रटौल का स्वाद दुनिया में पहुंचाने का काम कर रहे हैं।

भारत के आमों की गुणवत्ता, स्वाद और विविधता विश्व में अद्वितीय हैः सोहेल हाशमी
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘आमोत्सव-3‘ प्रख्यात लेखक, शोधकर्ता, सोहेल हाशमी ने ‘ भारत में आम की सांस्कृतिक विरासत और दुर्लभ किस्में‘ विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि आम केवल एक फल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, इतिहास और लोकजीवन का अभिन्न अंग है। इसकी विविध किस्में भारत की समृद्ध जैविक एवं सांस्कृतिक धरोहर का प्रतिनिधित्व करती हैं। उन्होंने भारत में पाई जाने वाली अनेक दुर्लभ एवं विशेष आम की किस्मों का परिचय कराया। उन्होंने प्रत्येक किस्म की विशेषताओं, स्वाद, रंग, आकार, पकने की अवधि तथा बाजार में उनकी उपयोगिता पर विस्तार से चर्चा की। साथ ही उन्होंने पारंपरिक किस्मों के संरक्षण, किसानों की आय बढ़ाने तथा जैव विविधता बनाए रखने में इन किस्मों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि ग्राफ्टिंग की प्रक्रिया के माध्यम से एक पेड़ पर दूसरी किस्म की शाखा लगाकर नई और बेहतर गुणवत्ता वाली किस्में विकसित की जाती हैं। यह परंपरा भारतीय बागवानी की समृद्ध विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने सांची क्षेत्र में खिरनी के पेड़ों का भी अध्ययन किया और यह भी उल्लेख किया कि चीकू तथा अमरूद जैसे फल मूल रूप से भारतीय नहीं हैं, बल्कि समय के साथ अन्य देशों से भारत आए और यहां की कृषि एवं खानपान का हिस्सा बन गए। श्री हाशमी ने बताया कि मेक्सिको से लेकर इंडोनेशिया तक अनेक देशों में आम की विभिन्न प्रजातियां मिलती हैं, किंतु भारत के आमों की गुणवत्ता, स्वाद और विविधता विश्व में अद्वितीय है। उन्होंने कहा कि भारत में मिलने वाली पारंपरिक किस्मों का स्वाद और उनकी सांस्कृतिक पहचान अन्य देशों के आमों से अलग है। उन्होंने विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों से आव्हान किया कि वे आम की पारंपरिक किस्मों के संरक्षण, उनके वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण तथा भावी पीढ़ियों के लिए इस समृद्ध प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित रखने में सक्रिय भूमिका निभाएं।
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर परिसर में विकसित किया जाएगा आम का बागः फाउंडर चांसलर  रमाशंकर सिंह 
आमोत्सव-3 के अवसर पर आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के फाउंडर चांसलर  रमाशंकर सिंह  ने कहा कि आईटीएम यूनिवर्सिटी देश में आम की दुर्लभ एवं पारंपरिक किस्मों के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रही है। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी परिसर में आम का बाग (आम संरक्षण उद्यान) विकसित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस उद्यान में देशभर की अधिकाधिक पारंपरिक एवं दुर्लभ आम की किस्मों को एकत्रित कर संरक्षित किया जाएगा। वर्तमान में रटौल आम के 100 पौधे लगाए जा चुके हैं। उन्होंने बताया कि भारत में लगभग दो हजार आम की किस्में पाई जाती हैं और यह हमारी अमूल्य प्राकृतिक एवं कृषि विरासत है। यदि सभी किस्मों का संरक्षण संभव न हो, तो कम से कम 400 से 500 महत्वपूर्ण किस्मों को सुरक्षित रखना समय की आवश्यकता है। फाउंडर चांसलर श्री रमा शंकर सिंह जी ने कहा कि आम केवल एक फल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और सभ्यता का अभिन्न अंग है। वैदिक काल से ही आम का उल्लेख भारतीय ग्रंथों और साहित्य में मिलता है, जो इसकी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि आज तथाकथित आधुनिक विकास के दौर में हमारी पारंपरिक भारतीयता और जैव विविधता कई चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में इस विरासत को बचाने की जिम्मेदारी समाज, शिक्षण संस्थानों, वैज्ञानिकों और नई पीढ़ी सभी की है। उन्होंने कहा कि भारत के सर्वश्रेष्ठ आम विश्व के बाजार तक पहुंचें और साथ ही देश के लोगों को भी उनकी उत्कृष्ट गुणवत्ता का लाभ मिले, इसके लिए संरक्षण, अनुसंधान और प्रसार पर समान रूप से कार्य करना होगा।
प्रकृति के उपहारों को मिल-बांटकर खाने से समाज में सकारात्मक ऊर्जा, आत्मीयता और सामाजिक सौहार्द बढ़ता हैः राज भाटिया
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘आमोत्सव-3‘ राज भाटिया (विधायक दिल्ली एवं पूर्व अध्यक्ष, आजादपुर फल मंडी, दिल्ली) ने कहा कि मेरा आम से जुड़ाव बचपन से है। जब मैं दो वर्ष का था, तब मेरी मां ने मुझे आ से आम सिखाया था, तभी से आम मेरे जीवन और स्मृतियों का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि आज विकास की तेज़ रफ्तार के बीच हम प्रकृति की अनमोल देन से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं। इसके साथ ही लोगों के बीच बैठकर बातचीत करने और प्राकृतिक परिवेश का आनंद लेने जैसी परंपराएं भी कम होती जा रही हैं। उन्होंने कहा कि प्रकृति से जुड़ाव बनाए रखना और उसकी धरोहरों का संरक्षण करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आम केवल बाजार में बिकने वाला फल नहीं है, बल्कि यह किसानों की मेहनत और भारतीय कृषि संस्कृति का प्रतीक है। उन्होंने स्वयं को सौभाग्यशाली बताते हुए कहा कि उन्हें पेड़ से सीधे आम तोड़कर खाने का अनुभव प्राप्त हुआ है, जो आज की पीढ़ी के लिए दुर्लभ होता जा रहा है। उन्होंने बताया कि मैं 18 राज्यों के लगभग 63 जिलों में आम की पैदावार को देख चुका हूं। उन्होंने विशेष रूप से रटौल आम का उल्लेख करते हुए कहा कि उसकी सुगंध इतनी अद्भुत होती है कि यदि उसे किसी कमरे में रखा जाए तो सात दिनों तक उसकी महक बनी रहती है। उनका मानना है कि प्रकृति के उपहारों को मिल-बांटकर खाने से समाज में सकारात्मक ऊर्जा, आत्मीयता और सामाजिक सौहार्द बढ़ता है। उन्होंने युवाओं से कृषि क्षेत्र को अपनाने की अपील करते हुए कहा कि आज कई युवा कृषि से दूरी बना रहे हैं, जबकि भविष्य में कृषि और उद्यानिकी के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण कृषि उत्पादन, आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक खेती के माध्यम से न केवल किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है, बल्कि भारत को वैश्विक कृषि बाजार में भी नई पहचान दिलाई जा सकती है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि कृषि की प्रत्येक गुणवत्ता वाली फसल के उत्पादन और विपणन में आने वाले वर्षों में व्यापक अवसर उपलब्ध होंगे।
प्रदर्शनीः 200 किस्म के आमों में पहली बार ग्वालियर में नजर आये रटौल आम ने हर किसी को ललचाया
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियार में आमोत्सव के तहत द्वितीय और अंतिम दिवस सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक 200 किस्मों के भारतीय आमों की प्रदर्शनी लगाई गई। इस प्रदर्शनी में विलक्षण किस्म के आम जिनमें ‘केशरी, जुलाई गोला, गोल गुलाब जामुन, फजली, हुसन परी, डिंगा, लंगडी, रस मुनिया, दशहरी, मालदा, सरहुली (सरौली), नरगिस रसीला, अनार दाना, तमुरिया, गुलाब खास, जाली बंदा, लंगड़ा, मशरूम, शामरी बीस, गुलाब, नील कंठ, लुंगी, फजली, मल्लिका, जलपरी, दिलपसंद, चैसा, दसहरी और रटौल‘ शामिल हैं। इसके अलावा मल्लिका, अम्रपाली,मशरूम, चैसा, हुस्नपरी, गुलाब, नर्गिस रसीला, डिग्गा, दशहरी, गुलाब जामुन, नीलकंठ, दिलपसंद, जाली बांदा, सबरी बीस, केसरी, लंगड़ा, जुलाई गोला, अनारदाना, तंबूरिया, फजरी सुपर, गुलाब खास, रटौल, पी.एन. फुल्ली, रसमुनिया, गोल गुलाब जामुन, किसम, फैज़ान, त्यामुरिया, पापाटियो, सेंसेशन, अंबिका, पीच, गोला अचार, अरुणिका, अल्फांसो (हापुस), पूसा अरुणिमा, अवध समृद्धि, स्वर्णरेखा, गोला भदैयाँ, अवध अभया, ओ.एम., सिंधु बंगनपल्ली, शंकर गोला, साहब पसंद, राजावाला, अम्रपाली, लंगड़ा, इलायची केसर, फजरी, महमूद बहार, पी.एफ.एन.-10, मंजीरा, मुसर्रत शास्त्री, फर्नांडिन नीलम, मैंगिफेरा ज़ेलानिका, एडवर्ड, एल्डन, केन्सिंग्टन, कीट (ज्ञमपजज), जेवियर, केंट, किचनर, ऑस्टीन, टॉमी एटकिंस, बथुई, खुदादाद, बाग-ए-बहार, बंगलोरा, नीलगोवा, टोटापुरी ममीडी, फ़ख्र-उस-समर, के.बी. करेल, स्टार्च, अस्वानिया, मालदा-2, पत्थर, हिमायत पसंद, लखनऊ सफेदा, रत्ना,जहाँगीर, सफेदा मुलगोवा, अलमास, वी.एन. चटर्जी, प्रभाशंकर, सी.जे.-2, कोंकण रुचि, चैसा ऑफ-सीज़न, अफीम, थियांगि, रानी पसंद, बप्पाकाई, पहाड़पुर सिंदूरिया, नवाब-उस-अम्दी, एम.एन. कलेक्शन-6, रोगिनी जरदा सहित 200 किस्मों की प्रदर्शनी लगाई गई।  इन विभिन्न किस्म के सर्वश्रेष्ठ क्वालिटी के इन आमों में रटौल किस्म पहली बार ही ग्वालियर के नागरिकों को देखने और खरीदने को मिला।
इसके साथ ही आम पर आधारित चित्रों की प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। जिसमें विभिन्न आमों की किस्मों की उत्पत्ति के बारे में जानकारियों भी प्रदर्शित थीं।
मेला में आम से बनी खीर, बर्फी, फालूदा सहित विभिन्न व्यजनों सभी को लुभाया, झूला झूलकर लिया आनंद
आमोत्सव के तहत मेला का आयोजन भी किया गया। जहां नीम वीथिका में प्रत्येक नीम का पेड़ आम सा नजर आया। बरसात के दिनों में पेड़ों पर पड़े झूलों पर झूल कर अतिथियों, शहरवासियों, छात्र-छात्राओं ने आनंद उठाया। इस मेले की खासियत यह रही कि यहां विभिन्न किस्म के व्यंजनों के स्टाल लगाए गए थे, इन सभी स्टाल्स पर आम से बने व्यंजन सभी के उपलब्ध रहे।
आमोत्सव-3 मेले में आम से बने इन व्यजनों की रही डिमांड
- श्रीखंड
- आम बर्फी
- आम सेंडविच
- गोल गप्पे
- आम खीर
- फ्रूटचार्ट
- मैंगो कुल्फी
- तीला कुल्फी
- पूड़ी आमरस
- आम लड्डू
- आम गुलाब जामुन
- आम रसमलाई
- आम रोल
- आम फालूदा
- आम रबड़ी
- आम टोस्ट

पौधारोपण कर दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश
आमोत्सव-3 के तहत द्वितीय दिवस भी संस्थान के सिथौली स्थित हाॅर्टिकल्चर बागवानी में अतिथियों द्वारा पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया। इस पौधारोपण की खास बात यह रही कि यहां दुनियाभर में विख्यात रटौल आम सहित अन्य प्रमुख आमों की किस्मों के पौधों को रोपित किया गया। इस दौरान आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के फाउंडर चांसलर  रमाशंकर सिंह  के अलावा सभी अतिथिगण और स्कूल आफ एग्रीकल्चर की डीन व स्टाफ एवं छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

छात्रों ने ड्रामा के माध्यम से लोकतंत्र को बचाने का दिया संदेश
आमोत्सव-3 के तहत स्किट/ड्रामा और आम पर केंद्रित फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। डा. संजय जादौन के निर्देशन में आम पर केंद्रित स्किट/ ड्रामा की प्रस्तुति 18 छात्र-छात्राओं के ग्रुप ने दी। इस प्रस्तुति के माध्यम से मधुवनी नाम के राज्य के राजा अल्फांजो को सेव भड़काता है। लेकिन राजा अल्फांजो ने अपनी बुद्धिमत्ता का प्रयोग करते हुए राज्य के सभी फलों से बात की और उनकी समस्या का समाधान किया। इस तरह राज्य के सभी फल राजा अल्फांजो से खुश हो गए और एपल ने भी अपनी गलती मानी। इस ड्रामा के माध्यम से छात्र-छात्र-छात्राओं ने लोकतंत्र को बचाने का संदेश दिया। वहीं पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष मनीष जैसल और उनकी टीम द्वारा आम पर केंद्रित किए गए वीडियो फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। 

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