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आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में परम्परागत डोकरा पद्धति से ‘धातु ढलाई कार्यशाला‘ का हुआ शुभारंभ


- युवाओं को भारतीय कला व संस्कृति से रूबरू कराना इस कार्यशाला का मूल उद्देश्य हैः प्रो-चांसलर डाॅ. दौलत सिंह चौहान

- पांच फुट से लेकर 6 फुट तक उंचाई की धातु की मूर्तियां की जाएंगी तैयारः क्यूरेटर मुश्ताक खान

- छात्र-छात्राओं के लिए होगा लाइव कार्यशाला का आयोजन

ग्वालियर ।  आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में भारतीय ज्ञान परम्परा अध्ययन पीठ के अन्तर्गत ‘धातु ढलाई कार्यशाला‘ संस्थान के तुरारी परिसर में प्रारंभ हुई। इस कार्यशाला में देश और विदेश में अपनी कला को पहचान दिलाने वाले ख्याति मूर्तिकार और कलाकारों का स्वागत किया गया। जहां सभी मूर्तिकारों ने पारंपरिक अंदाज में परम्परागत डोकरा पद्धति से कार्यशाला शुरू की। 30 दिवसीय इस कार्यशाला के क्यूरेटर और प्रख्यात हस्थशिल्पी मुश्ताक खान (सेवानिवृत्त उपनिदेशक, राष्ट्रीय हस्थशिल्प संग्रहालय, नई दिल्ली) एवं सहायक क्यूरेटर मुजाहिद खान द्वारा छत्तीसगढ़ के बस्तर, रायगढ़ और झारखंड के रांची से आए प्रख्यात हस्थशिल्पी, मूर्तिकार और कलाकारों का परिचय कराया। इस अवसर पर आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर प्रबंधन के वरिष्ठ पदाधिकारी और प्रोफेसर मौजूद रहे।
युवाओं को भारतीय कला व संस्कृति से रूबरू कराना इस कार्यशाला का मूल उद्देश्य हैः प्रो-चांसलर डाॅ. दौलत सिंह चौहान
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘धातु ढलाई कार्यशाला‘ के प्रारंभ अवसर पर आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के प्रो-चांसलर डाॅ. दौलत सिंह चौहान ने इस कार्यशाला के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि छत्तीसगढ़ के बस्तर और रायगढ़ एवं झारखंड के रांची से आए प्रख्यात हस्थशिल्पी, मूर्तिकार और कलाकार यहां 30 दिन तक रहकर आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर परिसर में अपनी प्रतिभा, हुनर और कला का प्रदर्शन करेंगे। ये कलाकार परम्परागत डोकरा पद्धति से अपने-अपने समुदाय के ग्राम देवी-देवाताओं की धातु की मूर्तियां बनाएंगे। उन्होंने बताया कि इस कार्यशाला का उद्देश्य छात्र-छात्राओं और युवाओं को भारतीय कला और संस्कृति हस्तांतरित करना है। साथ ही उन्हें भारतीय कला व संस्कृति से रूबरू कराना है। 
पांच फुट से लेकर 6 फुट तक उंचाई की धातु की मूर्तियां की जाएंगी तैयारः क्यूरेटर मुश्ताक खान
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘धातु ढलाई कार्यशाला‘ के क्यूरेटर और प्रख्यात हस्थशिल्पी मुश्ताक खान ने बताया कि आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के फाउंडर चांसलर श्री रमाशंकर सिंह जी ने धातु ढलाई कार्यशाला के लिए प्रेरित किया। इस कार्यशाला में छत्तीसगढ़ के बस्तर और रायगढ़ एवं झारखंड के रांची से आए प्रख्यात हस्थशिल्पी, मूर्तिकार और कलाकारों द्वारा 6 इंच से लेकर 16 इंच तक उंची मूर्तियां ही बनाई जाती हैं, लेकिन यह पहली बार होगा जब यह कलाकार धातु की 5 से लेकर 6 फुट उंचाई की मूर्तियां बनाई बनाएंगे। इन मूर्तियों को खास व परम्परागत डोकरा पद्धति से बनाया जायेगा। आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में यह अनुभव कलाकारों के लिए भी अनूठा होगा।
उन्होंने बताया कि मूर्तिकारों और कलाकारों द्वारा काली, लाल, पीती और दीमक की मिट्टी के साथ-साथ धान का छिलका का उपयोग कर मूर्ति के लिए मिट्टी तैयार की जाएगी। फिर सबसे पहले मिट्टी की मूर्तियां तैयार की जाएंगी। इसके बाद इन मूर्तियों पर मोम का काम होगा। मोम के काम के बाद मिट्टी को मूर्तियों पर दोबारा मिट्टी की परत चढ़ाकर सांचे तैयार किए जायेंगे। सांचे तैयार होने के बाद इनमें पीतल को पिघलाकर डाला जायेगा और मूर्तियां तैयार हो जाएंगी।

छात्र-छात्राओं के लिए होगा लाइव कार्यशाला का आयोजन
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘धातु ढलाई कार्यशाला‘ के माध्यम से छात्र-छात्राओं और युवाओं को कला एवं संस्कृति के प्रति प्रेरित करने के लिए लाइव कार्यशाला का आयोजन किया जायेगा। जहां छात्र-छात्राएं और युवा ख्यातिनाम हस्थशिल्पियों व कलाकारों से रूबरू होकर न सिर्फ उनके काम को समझ सकेंगे, बल्कि धातु से मूर्तियां विकसित करने की तकनीक और कला को आसानी से समझ सकेंगे।

इन हस्थशिल्पियों ने की कार्यशाला में शिरकत
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में आयोजित ‘धातु ढलाई कार्यशाला‘ में क्यूरेटर और प्रख्यात हस्थशिल्पी मुश्ताक खान (सेवानिवृत्त उपनिदेशक, राष्ट्रीय हस्थशिल्प संग्रहालय, नईदिल्ली) एवं सहायक क्यूरेटर मुजाहिद खान के अलावा बस्तर (छत्तीसगढ़) से टिलो बाई बेसरा, एरफुल बेसरा, फुलसिंह बेसरा, ललित बेसरा, सुधीर नेताम, निर्मल नेताम, रायगढ़ (छत्तीसगढ़) से सोहन लाल झारा, धरम कुमार झारा, चिंता लाल झारा, रुमिला झारा, कांती झारा और झारखंड रांची से पंचम मलार, झुबु मलार और अजय लाकड़ा ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। ये सभी मूर्तिकार 3 मई 2026 से 2 जून 2026 तक आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के तुरारी परिसर में अपने हनुर कर प्रदर्शन कर धातु की मूत्रियों को बनाकर अपनी कला रूपी जान फूंकने का कार्य करेंगे।

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