जयेंद्रगंज स्थित नदीगेट समीपस्थ माधव मंगल पैलेस में ऋषि सेवा समिति, ग्वालियर के तत्वावधान में आयोजित भागवत कथा के सप्तम दिवस पूज्य ऋषिजी ने कहा कि मनुष्य सुख पाना चाहता है परन्तु सही दिशा में प्रयास नहीं करता है। मनुष्य का स्वभाव है वह बिना किसी प्रयत्न और कष्ट के सुख चाहता है। मनुष्य पुण्य करना नहीं चाहता फिर भी पुण्य के फल की इच्छा रखता है। पाप करता है फिर भी पाप के फल को नहीं चाहता। वेद की ऋचाएं कन्या बनकर प्रभु सेवा करने आई थीं। वेद के तीन काण्ड व एक लाख मंत्र हैं। कर्मकांड जिसमें अस्सी हजार मंत्र जो ब्रह्मचारी के लिए हैं। उपासनाकाण्ड इसके सोलह हजार मंत्र जो गृहस्थ के लिए हैं।भगवान ने सोलह हजार उपासना रूपी वेद की ऋचाओं से विवाह किया। धर्म की मर्यादा में रहकर अर्थोपार्जन एवं गृहस्थ धर्म का पालन करना है।
सुदामा चरित्र की व्याख्या करते हुए पूज्य राघव ऋषि जी ने कहा कि सुदामा अर्थात् सुंदर रस्सी से बंधा हुआ। माता, पिता, भाई, पत्नी, पुत्र आदि दस रस्सियों से जीवरूपी सुदामा बंधा है। सुदामा जी गरीब थे । जो भगवान को देता नहीं वह गरीब होता है। सुदामा ज्ञानी थे। आजकल ज्ञान केवल अर्थोपार्जन का माध्यम रह गया है ज्ञान का फल धन या प्रतिष्ठा नहीं परमात्मा से मिलना है। सुदामा की पत्नी सुशील महान पतिव्रता थी। गरीब पति की निष्ठा से सेवा करने वाली पत्नी सुशीला । पति पत्नी साथ साथ रहकर प्रभु सेवा करते हैं तो ऐसा गृहस्थ आश्रम संन्यास से भी श्रेष्ठ कहा गया है। भगवान की सेवा पूजा माध्यम है परन्तु लक्ष्य परमात्मा से मिलना है। इसके लिए जीवन में साधना आवश्यक है। सुशीला के आग्रह पर पर साधना रूपी तंडुल पोटली में लेकर सुदामा जी द्वारिका की ओर प्रस्थान किए। दुर्बलता के कारण उन्हें मूर्छा आ गई भगवान ने सोते हुए सुदामा को गरुण के माध्यम से द्वारिका में पहुंचाया। जीव यदि दो कदम प्रभु के लिए आगे बढ़े तो भगवान सौ कदम आगे बढ़ते हैं। इस अवसर पर सौरभ ऋषि ने "अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो" भजन सुनाया तो लोग मंत्रमुग्ध हो गए। भगवान मनुष्य के वस्त्र या धन नहीं अपितु निर्मल हृदय देखते हैं।
सिंहासन पर बिठाकर भगवान ने अपने आंसुओं से सुदामा के चरणों को धोया। ऋषि जी ने बताया कि सुदामा पूर्वजन्म में केवट थे अतः प्रभु ने उनके चरणों को धोया। गरीब होना अपराध नहीं है परन्तु गरीबी में प्रभु को भूल जाना अपराध है। सुदामा पोटली को संकोचवश छुपा रहे थे। भगवान मन में हंसते हैं कि इसने उस दिन चने छुपाए थे और आज तंदुल। जो मुझे देता नहीं उसे मैं भी कुछ नहीं देता। भगवान ने तंदुल का प्राशन कर समस्त विश्व को अन्नदान का पुण्य सुदामा को दिया। सुदामा के ललाट पर विधाता ने लिखा था श्रीक्षय अर्थात् दरिद्र होगा इसे तिलक लगाते हुए भगवान ने उल्टा किया जो यक्ष श्री बन गया अर्थात् कुबेर जैसी संपत्ति। सुदामा की विदाई करते हुए भगवान रुक्मिणी व रानियों के आंखों में आंसू आ गए इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह के आंखों में भी आंसू आ गए।
कथा प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए ऋषिजी ने कहा कि परमात्मा जीव के मात्र निः स्वार्थ मित्र हैं जीव का परम कर्तव्य है भगवान की सेवा व साधना करे। निष्काम कर्म पाप को जला देता है। इच्छा भक्ति करती है इच्छा ही जीव के पुनर्जन्म का कारण है। जीव को माया ने पकड़ रखा है। जो परमात्मा की जय जयकार करता है वह माया के बन्धन से मुक्त हो जाता है। परीक्षित मोक्ष की चर्चा करते हुए ऋषिजी ने कहा कि परीक्षित रूपी जीव तभी मुक्त होता है जब शुकदेव रूपी गुरु मिलते हैं। प्रभु ने पवित्र विचार करने के लिए पवित्र मन दिया है। पवित्र विचार करने से ही मन शुद्ध होता है। भगवान की लीलाओं का चिन्तन करने से मन पवित्र हो जाता है। जीव व ब्रह्म का मिलन होता है।
पोथीपूजन एवं व्यासपूजन मुख्य यजमान श्रीमती चन्द्रकान्ता एवं श्री शिवराम अग्रवाल द्वारा सम्पादित किया गया। कथा झांकी पूजन श्रीमती प्रेमलता एवं श्री आनन्द मोहन अग्रवाल द्वारा किया गया। समिति के सर्वश्री संतोष अग्रवाल, संजय शर्मा, प्रमोद गर्ग, रामबाबू अग्रवाल, अम्बरीश गुप्ता, उमेश उप्पल, रामसिंह तोमर, देवेन्द्र तिवारी, हरिओम मिश्र, उदय प्रताप चितौड़िया, मनीष गोयल, बद्रीप्रसाद गुप्ता, दिलीप अग्रवाल, मनोज अग्रवाल, विष्णु पहारिया, अमित शिवहरे, अमित श्रीवास्तव आदि श्रद्धालुओं ने आरती की।
प्रातः 7:30 से पूज्य ऋषिजी द्वारा जन्मपत्रिका के माध्यम से निःशुल्क ज्योतिषीय परामर्श प्रदान कराया गया। सायं 7 बजे से महालक्ष्मी आराधना क्रम हवन द्वारा पूज्य ऋषिजी के संरक्षण में विश्राम हुआ। शनिवार को प्रातः 8 बजे पूर्णाहुति उपरान्त पूर्वान्ह 10 से 12 बजे तक विविध प्रसंगों पर पूज्य ऋषिजी द्वारा प्रकाश डाला जाएगा पश्चात कथा महाप्रसाद द्वारा इस वर्ष की कथा विश्राम लेगी।