भारतीय प्रवासी परिवारों में बदलाव, सामाजिक परिवर्तन, पारिवारिक कल्याण एवं नीतिगत प्रतिक्रियाओं पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार एवं हितधारक परामर्श आयोजित
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हैदराबाद;
हैदराबाद विश्वविद्यालय में संविधान की प्रस्तावना के सामूहिक वाचन से शुभारंभ, तीन तकनीकी सत्रों में शोधपरक विमर्श; सावित्रीबाई फुले ग्लोबल सुपर-30 शिक्षा उत्कृष्टता एवं प्रेरणा सम्मान-2026 से विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाएँ सम्मानित
हैदराबाद, 18 सितंबर 2026। भारतीय प्रवासी परिवारों में हो रहे सामाजिक एवं पारिवारिक बदलाव, पारिवारिक कल्याण, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, सांस्कृतिक पहचान तथा नीतिगत प्रतिक्रियाओं पर केंद्रित एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार एवं हितधारक परामर्श का आयोजन 18 सितंबर 2026 को हैदराबाद विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान विद्यालय के सम्मेलन कक्ष में किया गया। कार्यक्रम का आयोजन गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (जीकेएसएसएस), एस.आर.एम. विश्वविद्यालय, दिल्ली-एनसीआर, सोनीपत तथा हैदराबाद विश्वविद्यालय के भारतीय प्रवासी अध्ययन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। इसी अवसर पर सावित्रीबाई फुले ग्लोबल सुपर-30 शिक्षा उत्कृष्टता एवं प्रेरणा सम्मान-2026 भी प्रदान किए गए।
कार्यक्रम का शुभारंभ अमृता विद्यालयम की शिक्षिका एवं कवयित्री गया बालाजी चुम्बले के नेतृत्व में भारत के संविधान की प्रस्तावना के सामूहिक वाचन से हुआ। स्वागत उद्बोधन हैदराबाद विश्वविद्यालय के भारतीय प्रवासी अध्ययन केंद्र के प्रमुख प्रो. अजय के. साहू ने दिया। कार्यक्रम के उद्देश्य, रूपरेखा एवं सामाजिक प्रासंगिकता पर गोपाल किरन समाजसेवी संस्था के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने प्रकाश डाला।
उद्घाटन सत्र की मुख्य अतिथि हैदराबाद विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान विद्यालय की अधिष्ठाता प्रो. के. सुनीता रानी थीं, जबकि सत्र की अध्यक्षता डॉ. बी. आर. आंबेडकर मुक्त विश्वविद्यालय, हैदराबाद के शिक्षा विभाग की प्रमुख प्रो. जी. मैरी सुनंदा ने की। उद्घाटन सत्र में शिक्षा एवं सामाजिक क्षेत्र में उनके योगदान के लिए प्रो. जी. मैरी सुनंदा को सावित्रीबाई फुले सम्मान प्रदान किया गया तथा उन्हें सम्मान-पत्र एवं स्मृति-चिह्न भेंट किया गया।
इस अवसर पर बिहार के डॉ. सुधांशु कुमार चक्रवर्ती द्वारा लिखित पुस्तक ‘विकास-क्षितिज’ का विमोचन भी किया गया। प्रो. जी. मैरी सुनंदा ने पुस्तक की शैक्षणिक एवं शोधपरक सामग्री की सराहना करते हुए कहा कि इसमें प्रस्तुत विषयों की गंभीरता शोध-पत्रों के समान दिखाई देती है। उन्होंने संयुक्त एवं एकल परिवारों के सामने उत्पन्न हो रही नई चुनौतियों पर चर्चा करते हुए विभिन्न हितधारकों के बीच सहयोग एवं समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित प्रतिभागियों तथा ऑनलाइन माध्यम से जुड़े लोगों से संवाद और सहभागिता को आगे बढ़ाने का आह्वान किया तथा आयोजकों, श्रीप्रकाश सिंह निमराजे, डॉ. सुधांशु कुमार चक्रवर्ती एवं सभी प्रतिभागियों को बधाई दी।
कार्यक्रम में हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. गजेंद्र पाठक, भारत सरकार के उपक्रम सीएसएल के स्वतंत्र निदेशक एवं संचालक मंडल सदस्य डॉ. सीमा सूरी, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पूर्व कुलसचिव प्रो. डॉ. कृष्ण चंद रहलान, इंद्रायणी विद्या मंदिर, पुणे के प्राचार्य एवं प्रोफेसर प्रो. डॉ. संभाजी काशीनाथ मालघे, प्राचार्य डॉ. प्रमोद बबन धिवार, श्रीमती कलावती बधे कॉलेज, कोंढवा, पुणे, सावित्रीबाई फुले परिवार की पाँचवीं पीढ़ी की वंशज एवं बाबूराव घोलप महाविद्यालय, सांगवी, पुणे की सहायक प्राध्यापक डॉ. नूतन विष्णु लोणकर, डॉ. संदीप कुलश्रेष्ठ, डॉ. प्रियंका दत्ता, एस.आर.एम. विश्वविद्यालय, दिल्ली सहित अनेक शिक्षाविद्, शोधकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता एवं विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
सेमिनार के अंतर्गत तीन तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें भारतीय प्रवासी परिवारों में सामाजिक परिवर्तन, पारिवारिक कल्याण, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, सांस्कृतिक पहचान, परिवार की बदलती संरचना, नई पीढ़ी की चुनौतियाँ, बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल, कानूनी समस्याएँ तथा नीतिगत विषयों पर शोधपरक चर्चा हुई। विभिन्न प्रतिभागियों ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत करते हुए भारतीय प्रवासी परिवारों के बदलते स्वरूप और उनसे जुड़े सामाजिक सरोकारों को रेखांकित किया।
शोध-पत्र प्रस्तुत करने वालों में राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, तिरुपति के शिक्षा विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. जयंत नूनिया, लक्ष्मी सुरेश, डॉ. संजीव कुमार मिश्रा, डॉ. इंदु, के. अम्बुजाक्षन — आंबेडकरवादी लोकतांत्रिक मोर्चा, गया, पेरुंगला डाकघर, चेप्पल्लिल, कायंकुलम, केरल — तथा तहूरा नाज़ सहित अनेक शोधकर्ता शामिल रहे। शोध-पत्रों में प्रवासी भारतीयों के पारिवारिक जीवन, सामाजिक परिवर्तन, महिलाओं की भूमिका, शिक्षा, सांस्कृतिक पहचान, कानूनी चुनौतियों तथा नई पीढ़ी के सामने उपस्थित प्रश्नों पर विचार प्रस्तुत किए गए।
अपने संबोधन में गोपाल किरन समाजसेवी संस्था के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने कहा कि भारतीय प्रवासियों को केवल विदेशी मुद्रा, निवेश या आर्थिक योगदान के स्रोत के रूप में देखने के बजाय शिक्षा, ज्ञान, तकनीक, उद्यमिता, शोध, सांस्कृतिक आदान-प्रदान एवं सामाजिक विकास के महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि विदेशों में रहने वाले भारतीयों और उनके परिवारों को भूमि एवं संपत्ति विवाद, दस्तावेजों से संबंधित समस्याएँ, धोखाधड़ीपूर्ण लेन-देन, कानूनी सहायता तथा आपातकालीन परिस्थितियों जैसी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में शिकायतों के समाधान, संपत्ति संरक्षण एवं आपातकालीन सहायता के लिए अधिक प्रभावी संस्थागत व्यवस्था आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि प्रवासी नीति को केवल आर्थिक दृष्टिकोण तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि विदेशों में जन्मी और पली-बढ़ी नई पीढ़ी की भारतीय भाषाओं एवं सांस्कृतिक पहचान, महिलाओं, विद्यार्थियों, बुजुर्ग माता-पिता तथा पारिवारिक संबंधों से जुड़े विषयों को भी नीति के केंद्र में रखा जाना चाहिए। इसके लिए सरकार, विश्वविद्यालयों, प्रवासी संगठनों, सामाजिक संस्थाओं और अन्य हितधारकों के बीच समन्वित प्रयास आवश्यक हैं।
कार्यक्रम के दौरान ‘गिरमिटिया’ नाटक का प्रभावशाली मंचन किया गया। नाटक की संकल्पना, निर्देशन एवं अभिनय डॉ. सुधांशु कुमार चक्रवर्ती ने किया, जबकि छत्तीसगढ़ की अभिनेत्री भानुमती ने भी इसमें सहभागिता की। नाटक के माध्यम से प्रवासी मजदूरों के विस्थापन, श्रम, संघर्ष और सामाजिक परिस्थितियों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के लोक गायक श्री गोपाल पोयम ने दंतेश्वरी पर आधारित लोकगीत की प्रस्तुति दी। उनकी प्रस्तुति से कार्यक्रम में बस्तर की लोक-सांस्कृतिक परंपरा और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत की विशेष झलक देखने को मिली। भरतनाट्यम की प्रस्तुति ने भी कार्यक्रम में सांस्कृतिक गरिमा जोड़ी, जिसे उपस्थित लोगों ने सराहा।
कार्यक्रम में सावित्रीबाई फुले ग्लोबल सुपर-30 शिक्षा उत्कृष्टता एवं प्रेरणा सम्मान-2026 के अंतर्गत शिक्षा, सामाजिक सेवा, साहित्य, संस्कृति, शोध, रचनात्मक कार्य एवं सामाजिक सरोकारों के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले चयनित प्रतिभागियों को सम्मानित किया गया। वक्ताओं ने कहा कि सावित्रीबाई फुले की शिक्षा, समानता, महिला सशक्तिकरण एवं सामाजिक परिवर्तन की विरासत आज भी समाज के लिए प्रेरणा का महत्वपूर्ण स्रोत है।
आंध्र प्रदेश से डॉ. के. अनीता, नल्लामिल्ली संतोष भामी रेड्डी, डॉ. वाई. सुमित्रा एवं डॉ. जयंत नूनिया; बिहार से नीता सहाय, अशोक कुमार श्रीवास्तव, डॉ. सुधांशु कुमार चक्रवर्ती, डॉ. महेश कुमार चौधरी एवं डॉ. मल्लिका मंजरी; छत्तीसगढ़ से सुश्री लीला मानिक, श्री हैरी जोसेफ, श्री गोपाल पोयम, डॉ. रश्मि लता मिश्रा, डॉ. कुबेर सिंह गुरिपंच, श्रीमती कांति मौर्य, दुर्गेश संजय किशोर, मणिप्रभा त्रिपाठी, विमला बिंदिया रानी गंगबर, डॉ. बोधि राम साहू, श्रीमती ज्योति सराफ, प्रो. के. मुरारी दास, भानुमती कोसरे, डॉ. प्यारे लाल अडिले एवं डॉ. पूर्णिमा सरोज को सम्मानित किया गया।
दिल्ली से डॉ. संजीव कुमार मिश्रा, तहूरा नाज़, डॉ. सीमा सूरी एवं डॉ. जतिन शर्मा; गुजरात से कीर्तिबेन राजेंद्रभाई मकवाना, गोहिल अल्काबहेन कानुभाई एवं प्रो. डॉ. देवाकर एस. दिनेश गौड़; हरियाणा से डॉ. उषा शर्मा, प्रो. डॉ. कृष्ण चंद रहलान एवं लाजपत राय सिंगला; कर्नाटक से प्रो. एन. शांति कोकिला (कनक), श्रीमती राजश्री प्रसाद, डॉ. प्रेमचंद चव्हाण, श्रीमती शोभा डी. एवं डॉ. कृष्ण नायक; केरल से के. अम्बुजाक्षन एवं डॉ. इंदु के. वी.; मध्य प्रदेश से डॉ. सलमा जमाल, डॉ. सरिता भवानी मालवीय, मोहन सिंह यादव, डॉ. गुंजा पंवार, डॉ. सुनीता पांड्रो, डॉ. श्रीमती रीना बाजपेयी, श्रीमती मीरा दावर एवं राम नारायण मेहर को सम्मानित किया गया।
महाराष्ट्र से विनोद कुमार दुबे, डॉ. नूतन विष्णु लोणकर, डॉ. प्रमोद बाबन धिवार, प्रो. डॉ. संभाजी काशीनाथ मालघे, माया एस. एच. एवं राजकुमार रामलखन यादव; राजस्थान से कवि डॉ. दिनेश व्यास एवं महेंद्र कुमार मिथारवाल; तमिलनाडु से श्रीमती लक्ष्मी सुरेश, डॉ. बी. मल्लिका, मंशा दुबे एवं एस. वैष्णवी; तेलंगाना से डॉ. अंजली कुमारी, प्रो. जी. मैरी सुनंदा, डॉ. नरसिम्हा राव कल्याणी, अधिप श्याम महिंदरकर, गया बालाजी चुम्बले एवं सन्निधि नीलिमा रानी; उत्तर प्रदेश से डॉ. कृष्ण कुमार, डॉ. संजीव कुमार, डॉ. सुनीता श्रीवास्तव, अनिल कुमार श्रीवास्तव, हर्षित श्रीवास्तव एवं डॉ. चित्रा गुप्ता तथा उत्तराखंड से डॉ. रमेश राम सहित अन्य प्रतिभागियों को सम्मान प्रदान किया गया।
कार्यक्रम के दौरान सुनीता श्रीवास्तव, मोहन सिंह, आकाश एवं विष्णु द्वारा अतिथियों को शॉल, स्मृति-चिह्न एवं पौधे भेंट कर स्वागत किया गया। तकनीकी सत्रों में परिवार की बदलती संरचना, विदेशों में रहने वाली नई पीढ़ी की भाषा एवं सांस्कृतिक पहचान, महिलाओं की भूमिका, विद्यार्थियों की चुनौतियाँ, बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल, भूमि एवं संपत्ति विवाद तथा विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए कानूनी सहायता जैसे विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। शोध-पत्रों एवं प्रतिभागियों के अनुभवों ने इन विषयों पर आगे शोध और नीतिगत संवाद के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत किया।
तकनीकी सत्र के समापन पर के. मुरली ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम के अंत में हैदराबाद विश्वविद्यालय के भारतीय प्रवासी अध्ययन केंद्र की पीएच.डी. शोधार्थी बीबा सी. बाबू ने उपस्थित अतिथियों, शोधकर्ताओं, प्रतिभागियों, आयोजकों एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
आयोजकों ने कहा कि भारतीय प्रवासी परिवारों को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं, बल्कि ज्ञान, शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक विकास और मानवीय संबंधों के व्यापक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। विश्वविद्यालयों, सरकार, प्रवासी संगठनों एवं सामाजिक संस्थाओं के बीच निरंतर संवाद और सहयोग से भारतीय प्रवासी परिवारों से जुड़े सामाजिक, पारिवारिक एवं नीतिगत विषयों पर भविष्य में और अधिक प्रभावी पहल की जा सकती है। इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार एवं हितधारक परामर्श का उद्देश्य इसी दिशा में शोध, संवाद और सहयोग के लिए एक साझा मंच उपलब्ध कराना था।