प्रपंचों से मुक्त करा देती है महामाया की उपासना: मां कनकेश्वरी

- महलगांव करौलीमाता मंदिर में श्रीमद्देवी कथा का विश्राम 
ग्वालियर। मनुष्य स्वयं के प्रपंचों में फंसा हुआ है, लेकिन यदि वह महामाया की उपासना करता है तो वह उसे प्रपंचों से मुक्त कर देती है,लेकिन मां की आराधना करने के लिए व्यक्ति का सदाचारी होना जरूरी है। यह विचार अग्नि अखाड़े की महामंडलेश्वर मां कनकेश्वरी ने महलगांव करौलीमाता मंदिर एवं कुंवर महाराज मंदिर प्रांगण में आयोजित श्रीमद्देवी कथा के विश्राम दिवस शनिवार को व्यक्त किए। इस अवसर पर खनेताधाम के महामंडलेश्वरी रामभूषण दास महाराज एवं धूमेश्वर धाम के अनिरु द्धवन महाराज का महामंडेश्वर कपिल मुनि महाराज ने स्वागत सम्मान किया। रविवार को हवन पूजन और नवकुंडीय यज्ञ की पूर्णाहुति और भंडारे के साथ 11 दिवसीय अनुष्ठान का समापन होगा। देवी कनकेश्वरी ने देवी कथा का रसपान कराते हुए कहा कि ईश्वर को समझते समझते यदि हमने परमात्मा को निकटता से देख लिया, तो उसे हमने मां कहा। भगवान द्वारिकाधीश हों या श्रीनाथ भगवान, उनका श्रंृगार नाक के आभूषण से आरंभ होता है,क्योंंकि वो स्वभाव से मां है। पूतना जैसी राक्षस भी जब परमात्मा के निकट पहुंच गई तो उन्होंने उसके पापों से दृष्टि फेरकर उसे अपना परमधाम प्रदान किया, इसलिए परम ब्रह्म की आराधना के साथ संसार की सेवा करते रहें। 
उन्होंने कहा कि दुनिया में सिर्फ भारत भूमि ही ऐसी जगह है, जहां जप, तप, कथा यज्ञ से अपने साथ अपने पूर्वजों की भी सद्गति करा सकते हैं। यह सुख सुविधा तो स्वर्ग में भी उपलब्ध नहीं हैं। सूर्य की आराधना करो। सूर्य के प्रकाश से सारी विद्या प्रकाशित हो जाती हैं। जो श्रीकृष्ण के पास जाने का प्रयास करते हैं, उन पर राधारानी का भी अनुगृह होता है। सिद्ध साधु कभी क्रोध नहीं करता है, वह तभी सिद्ध होता है,लेकिन जब वह क्रोध करता है तो वह क्रोध नहीं उसका अनुगृह होता है। गुरू चरण औैर गुरू वचन साधक की आध्यात्मिक उन्नति का आधार है। चित्त जितना विशुद्ध होता है, तो चेतना उसी गति से उन्नति करती है।तुलसी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि सालिगराम ने तुलसी को वरदान दिया कि तुलसी के बगैर नारायण की पूजा नहीं होगी। स्वयं नारायण ने तुलसी स्त्रोत का पाठ किया है। धर्म-कर्म के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि अपनी मर्जी से वासना मुक्त रहने का प्रयास कर्म हैं और वेदों के अनुसार जीवन निर्वहन करना धर्म हैं। अपनी मर्जी से करोगे तो बंधन और सद्गुरू की मर्जी से करोगे मुक्त हो जाएगी। उन्होंने कहा कि प्यासे को पानी और भूखे को भोजन कराने में योग्यता और अयोग्यता नहीं देखी जाती है।
रुद्राक्ष पहन गलत काम न करें.....
उन्होंने कहा कि जल्दी आगे निकलने की वृत्त खतरनाक है। इसमें व्यक्ति छल प्रपंच, धोखाधड़ी का सहारा लेता है। उन्होंने कहा कि आजकल लोग इस असमंजस में रहते हैं कि हम जो रुद््राक्ष धारण कर रहे हैं, वो असली है या नकली। रुद्राक्ष असली हो या न हो,लेकिन पहनने वाला असली होना चाहिए। असली रुद्राक्ष पहनकर यदि गलत काम करेंगे तो क्या भोलेबाबा की कृपा हो सकती है? गुरूमुखी होकर जो गलत काम करता है, उसकी दुगर्ति होने से कोई नहीं बचा सकता है।
खुद का महिमा मंडन नहीं करते संत
गायत्री की महिमा बताते हुए उन्होंने कहा कि स्वयं नारायण ने गायत्री के सहस्त्रनाम का पाठ किया। उन्होंने कहा कि संत और विद्वानों में भेद है। संत कभी खुद को सर्वश्रेष्ठ नहीें कहते,बल्कि अन्य संतों का गुणगान करते हैं, लेकिन विद्वान सदैव खुद को महिमामंडित करने में लगे रहते हैं। कथा तो ग्रंथों में भी मिल जाएगी,लेकिन जीवन सीखना है तो संतों की शरण में जाना पड़ेगा। परमात्मा को भजो तो प्रकृति आपकी रक्षा करेगी, जिसने अपनी प्रकृति को ठीक नहीं किया तो घर में भी उसका सम्मान नहीं होता है। 
गुरूकृपा से सिद्ध हो जाती है शिष्य की वाणी.....
इस मौके पर खनेता धाम से आए महामंडलेश्वर रामभूषण महाराज ने कहा कि मां कनकेश्वरी स्वयं शक्ति स्वरूपा हैं, जिनके मुख से ग्वालियर के श्रद्धालुओं को मां शक्ति का कथा श्रवण का सौभाग्य मिला।इनके दर्शन मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं। इनकी वाणी से अंतकरण पवित्र हो जाता है। गुरूकृपा से जब कोई  शिष्य बोलता है तो साक्षात ठाकुरजी की वाणी उसमें से प्रस्फुटित होती है।
दो महामंडेश्वर ऐसे हो गए समधी.....
धूमेश्वरधाम के महामंडलेश्वर अनिरुद्धवन महाराज ने कनकेश्वरी देवी का एक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि जब वे एक बार धूमेश्वर आईं तो हमने पूछा क्या सत्कार करें। तो उन्होंने विनोद में कहा चाय चालक, कॉफी कपटी और दूध देवता पीते हैं तो हम तो दूध ही पीएंगे। उन्होंने कहा कि ब्रह्मरस वही पिला सकता है जो उसमें डूबा हुआ हो। यहां तो शक्ति की कथा स्वयं शक्ति ने ही सुनाई है। खनेता महाराज से समधी का अनोखा रिश्ता बताते हुए कहा कि धूमेश्वर में तुलसी विवाह के दौरान रामभूषणदास महाराज सालिगराम की बारात लेकर आए थे, इसलिए वह हमारे समधी हुए।

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