जिसकी मधुर वाणी एवं पान में सदा दिखती थी मीठा होने की होड
जौरा -सौरभ गुप्ता
नगर की एक ऐसी चर्चित शख्सियत जिसके जाने का मलाल शहर की हर छोटी बड़ी हैसियत के शख्स को हैरान कर गया। दोपहर उपरांत एक धर्मिक आयोजन के बीच जैसे ही मांगीलाल बंसल पान वालों के दिवंगत होने की खबर मन को गहराई तक व्यथित कर गई। मैं पूरी तरह अवसाद से भर गया। मेरा मन इस गैर भरोसेमंद खबर पर यकीन करने को तैयार नहीं था। एक ऐसा शख्स जो हर छोटे बड़े को अदब के साथ अपने अनूठे आत्मीय अंदाज में अगबानी ही नहीं करता था अपितु उनके स्दावानुसार पान खिलाकर ही उन्हें रूखसत होने देता था। उनके पान और आत्मीय व्यवहार के बीच अक्सर कौन अधिक मीठा है इस बात की अजीब प्रतिस्पर्धा होती थी। उनके हाथों में शायद कोई जादू ही था जो शख्स एक बार उनके हाथ का लगा पान खा लेता था वह सदा सर्वदा के लिए उनका हो जाता था। मांगीलाल बंसल जी के हाथ का लगे पान का स्वाद लोगों की जुबान पर बसता था। लोगों को वह चाहे वह पान खाने का शौकीन हो अथवा नहीं उनके स्नेह की डोर से बंधा दुकान की ओर खिंचा चला जाता था।
मैंने उनके जीवन के संघर्षों को भी काफी नजदीकी से देखा है। संघर्षों के झंझाबातों के बीच भी मुझे उनके चेहरे पर मायूसी अथवा निराशा की कोई झलक दिखाई नहीं दी। मेरे देखते देखते उन्होंने अपने संघर्ष पर जीत हासिल करते हुए शहर में हर व्यक्ति के अजीज बने रहे। मेरा खुद का भी विगत कई वर्षों से यही हाल रहा। लेकिन जब से होश संभाला मुझे उनसे सदैव एक अनूठी आत्मीयता हासिल हुई। आत्मीय मांगीलाल भाई साहब से उम्र में कई दशक छोटा होने के बावजूद ना जाने कैसे उनके लिए मैं गुरु के संबोधन का पात्र बन गया यह आज तक मेरी समझ में नहीं आया। मैं ऐसा आज तक नहीं हुआ। ग्वालियर, भिंड मुरेना सहित काफी दूर से आने वाले लोगों की भी एक बड़ी जमात थी जो एक बार मांगी चाचा जी का पान खाकर गया यह देखो द्वारा शहर में आया तो मांगी चाचा जी का पान खाने का संकल्प लेकर ही आया। शहर में आकर जिसने मांगी भाई चाचा जी का पान नहीं खाया तो वह एक अजीब बेचैनी लेकर ही लौटता था।
ऐसे शख्स का इस दुनिया से यूं अचानक चले जाना मेरे व्यक्तिगत अहसासों को आहत करने वाला है। दुख के सागर के बीच सुकून सिर्फ इस बात का है कि वह अपने सद्ए ब्यवहार और पान लगाने का हुनर अपनी विरासत में संजय बंसल को सौंप कर गए हैं। मुझे यकीन है कि उनके पुत्रगण सागर, दीपक,संजय एवं पवन सहित नाती विक्की बंसल उनकी विरासत को उन्हींं की तरह संभालेंगे। सचमुच मेरे प्रति आत्मीयता रखने वाले गिने-चुने लोगों में से आदरणीय मांगीलाल बंसल जी का स्थान अद्वितीय है। भावों की व्यग्रता ने मुझे अपने नि:शब्द कर दिया है। परमपिता परमेश्वर से बस यही प्रार्थना है कि ऐसी निष्प्रह, सहज,सरल आत्मा को अपना सानिध्य प्रदान कर सद्गति दें एवं परिजनों को वेदना के इन क्षणों को सहन करने की शक्ति एवं संबल प्रदान करें।