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MPCCI ने प्रस्तावित नवीन गाईड लाईन "वर्ष 2026-27" पर आपत्तियाँ एवं सुझाव जिला पंजीयक को किए प्रेषित

ग्वालियर । MPCCI अध्यक्ष-डॉ. प्रवीण अग्रवाल, संयुक्त अध्यक्ष-हेमन्त गुप्ता, उपाध्यक्ष-डॉ. राकेश अग्रवाल, मानसेवी सचिव-दीपक अग्रवाल, मानसेवी संयुक्त सचिव-पवन कुमार अग्रवाल एवं कोषाध्यक्ष-संदीप नारायण अग्रवाल ने प्रेस को जारी विज्ञप्ति में अवगत कराया है कि, “जिला ग्वालियर में अचल सम्पत्तियों का वर्ष 2026-27 में मूल्य निर्धारण हेतु प्रस्तावित कलेक्टर गाईड लाईन पंजीयन विभाग द्वारा ऑनलाईन पोर्टल पर प्रकाशित कर आमजन से आपत्ति व सुझाव आमंत्रित किए गए हैं, जिसके तहत आज MPCCI द्वारा सुझाव व आपत्तियाँ निम्नानुसार प्रस्तुत की गई हैं” :-
* यहकि, प्रस्तावित गाईड लाईन के लिए क्रेडाई, ग्वालियर द्वारा आपको प्रस्तुत किए गए सुझाव एवं आपत्तियों की एक प्रति हमारे को उपलब्ध करवाई गई, जिसका हमारे द्वारा अध्ययन किया गया और पाया गया कि सभी सुझाव व आपत्तियाँ उचित एवं न्यायोचित हैं । इसलिए उन सभी पर हमारी सहमति के साथ आग्रह है कि  क्रेडाई द्वारा प्रस्तुत बिन्दुवार सुझावों पर गंभीरता पूर्वक विचार कर, उन्हें प्रस्तावित गाईड लाईन में अवश्‍य शामिल किया जाए ।
*   यहकि आवासीय भवन निर्माण की लागत दर रु. 13 हजार एकरूपता में दर्शित है, लेकिन यदि व्यवसायिक दृष्टि से दुकान अथवा शोरूम को क्रय किया जाता है, तब उस दुकान अथवा शोरूम के निर्माण की लागत जोड़ी जाती है । इसका प्रमाण है कि गाईड लाईन के अंदर जहाँ-जहाँ कॉमर्शियल भूमि की दर हैं और निर्मित कॉमर्शियल प्रोपर्टी की दर के अंतर की गणना करते हैं, तब कहीं भी एक दर से उसकी गणना नहीं की गई      है । जबकि कॉमर्शियल भूखण्ड का निर्माण चाहे महाराज बाड़ा, थाटीपुर अथवा बहौड़ापुर क्षेत्र में या अन्य कहीं पर भी किया जाए, निर्माण की लागत में अंतर नहीं आता है । वहीं उच्च श्रेणी का कॉमर्शियल निर्माण होता है, तब उसकी लागत रु. 10 हजार वर्ग मीटर से अधिक नहीं हो सकती है । इसलिए इस असमानता को दूर करने के लिए शहर ग्वालियर की गाईड लाईन में व्यवसायिक निर्मित स्थान को क्रय-विक्रय के लिए उस क्षेत्र के लिए निर्धारित व्यवसायिक भूखण्ड की दर में रु. 10 हजार जोड़कर ही निर्धारित की जाए, जिससे एक समानता भी दिखेगी और सरकार की मंशा भी समान रूप से परिलक्षित होगी । इस संबंध में हमारे द्वारा गत्‌ वर्षों में भी अपनी आपत्ती व सुझाव प्रेषित किए गए थे ।
*   प्रायः देखने में आता है कि किसी क्षेत्र में एक-दो विक्रय-पत्र कलेक्टर गाईड लाईन से संपादित हो जाते हैं, तब उन दस्तावेजों को ही उस क्षेत्र की दर बढ़ाने का आधार मान लिया जाता है । जबकि इसे आधार मानना न तो न्यायोचित है और न ही शहर के विकास के लिए उपयोगी है क्योंकि एक या दो विक्रय-पत्र क्यों अधिक दर पर संपादित हुए हैं, इसकी समीक्षा नहीं किया जाना प्रतीत होता है । यदि उसकी समीक्षा की जाती तो वास्तविक कारण सामने आने पर उस पर वास्तविकता के आधार पर दर निर्धारण का निर्णय लिया जा सकता था । अतः मात्र एक या दो विक्रय-पत्र निर्धारित कलेक्टर गाईड लाईन से अधिक दर पर संपादित  होने से उस क्षेत्र की कलेक्टर गाईड लाईन की दरें, जब तक नहीं बढ़ाई जावे, जब तक किसी क्षेत्र में एक वित्तीय वर्ष में संपादित होने वाले विक्रय-पत्र व उस क्षेत्र के लिए निर्धारित विक्रय संख्या, उस क्षेत्र में हुए कुल विक्रय-पत्रों के 25 प्रतिशत न हो, तब तक वहाँ पर दर बढ़ाने का निर्णय नहीं लेना चाहिए ।
*   वार्ड क्रमांक-60 ‘कृष्णा हाइट्स’ की प्रस्तावित गाईड लाइन ः
यह कि, संपदा-02 में वर्ष 2026-27 की संभावित गाईड लाइन में कृष्णा हाइट्स की गाईड लाइन को काफी बढ़ाया गया है, जबकि कृष्णा हाइट्स से लगी हुई यशोदा गृह निर्माण एवं लोटस विला आदि सहित आसपास की लगी हुई कॉलोनियों की गाईड लाइन रु. 40 हजार वर्गमीटर है, जबकि कृष्णा हाइट्स की गाईड लाइन 80 हजार वर्गमीटर है, जो कि काफी अधिक होने के साथ ही, औचित्यहीन है ।
अतः आसपास स्थापित सोसायटी के अनुरूप ही कृष्णा हाइट्स की गाईड लाईन प्रस्तावित किए जाने की आवश्‍यकता है, ताकि भवन क्रय करने वाले हितग्राहियों को राहत मिल सके ।
*   किसी भी शहर में भूमि का उपयोग मास्टर प्लान के अंदर निर्धारित किया जाता है और समय-समय पर सरकार द्वारा उस मास्टर प्लान के पालन के लिए ड्राइव भी चलाई जाती है, लेकिन असमंजस उस स्थिति में हो जाता है, जब आवासीय क्षेत्र में जिला पंजीयक कार्यालय द्वारा गाईडलाईन के मुताबिक उसकी रजिस्ट्री वाणिज्यिक मानते हुए की जाती है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण कलेक्टर गाईडलाईन का यह प्रावधान है कि मुख्य मार्ग से 20 मीटर अंदर तक के क्षेत्र को कॉमर्शियल माना जाता है, चाहे वह मास्टर प्लान के मुताबिक आवासीय एवं पी.एस.पी. ही क्यों न हो ?
अतः हमारा अनुरोध है कि मास्टर प्लान को कलेक्टर गाइड लाइन से लिंक किया जाना चाहिए, ताकि जो क्षेत्र जिस उपयोग के लिए निर्धारित हो, उसी के लिए रजिस्ट्री हो सके तथा भविष्य में बहुत सारे विवाद उत्पन्न न हों ।
*   कृषि भूमि के क्रय-विक्रय पर वर्तमान प्रावधान के अनुसार 1000 मीटर तक स्लेब का प्रावधान है और यह रजिस्ट्री जितने खरीददार होंगे, उन सब पर अलग-अलग 1000 मीटर का स्लेब प्रावधान है ।
उदाहरणार्थ ः यदिकोई कृषि भूमि जो पाँच हजार वर्गमीटर है । यदि पाँच लोग मिलकर उस भूमि को खरीदना चाहते हैं, तो ऐसी स्थिति में पूरी जमीन की गणना प्लॉट के रेट प्रति वर्गमीटर से की जाएगी, जो कि बहुत बड़ी विसंगति है, जबकि वास्तविकता में जो धनराशि का अंतरण होता है, वह बीघा के हिसाब से ही होता है और चूंकि आयकर विभाग द्वारा सर्किल/कलेक्टर गाइडलाइन को ही भूमि/भवन के मूल्य निर्धारित करने में मान्यता दी जाती है, तब ऐसी स्थिति में आयकर विभाग के मुताबिक वास्तविक कीमत से कई गुना बढ़ जाती है और निवेशक को उस पर आयकर चुकाना पड़ता है । वह ऐसा आयकर होता है, जो इन विसंगतियों के कारण काल्पनिक आय निर्धारित हुई, उसका परिणाम होता है, ऐसी स्थिति में बहुत सारी जगह के क्रय-विक्रय में यह बाधा बनती हैं व कई विवाद को जन्म देती हैं ।
अतः हमारा अनुरोध है कि एग्रीकल्चर भूमि जिस पर शासन द्वारा डायवर्सन शुल्क भी लिया जाता है, उसके दस्तावेज के पंजीकरण के वक्त यह स्लेब का प्रावधान आवश्‍यक रूप से हटाया जाना चाहिए ।
*   वर्तमान में कलेक्टर गाइड लाइन में यदि किसी भूमि/भवन के बगल में 2 फुट की गली जो कि पुराने मकानों में अक्सर पाई जाती है । यह गली दो पड़ौसियों के बीच में अपनी-अपनी मौरी के निकास के लिए बनाई जाती थीं । ऐसी अवस्था में उस प्लाट या मकान की कलेक्टर गाइड लाइन में निर्धारित दर पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त कॉर्नर प्लॉट सरचार्ज के रूप में जोड़ा जाता है, जो कि पूर्णतः अव्यवहारिक है । कॉर्नर प्लॉट या मकान की गणना के लिए स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए कि जिस क्षेत्र में मकान/भूमि स्थित है, उस क्षेत्र की मुख्य सड़कों की चौड़ाई से कम से कम आधी चौड़ाई से अधिक की पाई जाती है, तब उसे कॉर्नर प्लॉट के रूप में माना जाना चाहिए ।
*   यहकि, रियल एस्टेट सेक्टर में वर्तमान में बहुमंजिला भवनों में प्रकोष्ठ रूप में बिक्री हो रहे हैं, जिसमें स्थानीय निकाय के सक्षम प्राधिकारी/विभाग द्वारा भवन निर्माण अनुमति में म. प्र. भूमि विकास नियम-2012 की सारणी 42(1), ग्वालियर विकास योजना-2035 सारणी 5-सा-2 एवं बिन्दु क्र. 5.9.1 के अनुरूप फर्शी तल अनुपात (एफ.ए.आर. आधारित) अनुसार संबंधित क्षेत्र के भूमि-भूखण्ड की मूल्यांकित राशि को निर्माण योग्य विभाज्य क्षेत्र में विभाजित होकर लागू किए जाने का प्रावधान होना चाहिए ।
*   यहकि, किसी भी चिन्हित भूमि-भूखण्ड के सभी सीमांत भुजाओं पर सुरक्षा की दृष्टि से यदि बाउण्ड्रीवॉल का निर्माण कराया जाता है, तो उसे क्रेता-विक्रेता के भूखण्ड की सुरक्षा में किए गए कार्य की सदभावी दृष्टि से देखा जाना चाहिए और वर्तमान प्रावधान अनुसार 10 प्रतिशत की अतिरिक्त वृद्धि की मूल्यांकन क्रिया को तत्काल प्रभाव से बंद किए जाना चाहिए । क्योंकि यदि क्रेता-विक्रेता का भाव मकान की नींव भरना होता, तो भूमि-भूखण्ड के अंदरुनी भुजाओं पर भी नींव या दीवार का काम कराया जाता और यदि किसी भूमि-भूखण्ड पर अंदरूनी दीवारों पर भी कोई नींव-दीवार का निर्माण कार्य कराए जाने के उपरांत अंतरण किया जाता है, तो उस पर यह वृद्धि उचित है ।
*   आयकर प्रावधानों के मुताबिक भूमि/भवन/प्रोपर्टी के क्रय-विक्रय पर लाभ होने की दशा में केपिटल गेन होने पर आयकर दिए जाने का प्रावधान है और इस केपिटल गेन की गणना में कलेक्टर गाइड लाइन/सर्विस गाइड लाइन का मुख्य रोल होता है । अतः कलेक्टर गाइड लाइन/सर्किल गाइड लाइन, सम्पत्ति की वास्तविक दर से अधिक होती है, तब वहाँ निवेशकों द्वारा सम्पत्ति का क्रय-विक्रय रुक जाता है, ऐसी अवस्था में शहर का विकास रुक जाता है ।
अतः हमारी पुरजोर माँग है कि गाइड लाइन को व्यावहारिक बनाने के लिए हमारे सहित अन्य प्राप्त सुझावों को गाइड लाइन के अंतिम प्रारूप में अवश्‍य शामिल किया जाए ।

:: उपबंध ::
*   वर्तमान में कृषि भूमि का 50% से ज्यादा उपयोग करने की अनुमति नहीं है । साथ ही, भूअर्जन अधिनियम-2013 की धारा 102 के अन्तर्गत कृषि भूमि के मूल्यांकन का 40% से ज्यादा मुआवजा नहीं दिया जाता है । आपके द्वारा 1000 वर्ग मीटर कृषि भूमि पर औसतन 82% विकसित क्षेत्रफल मानकर मूल्यांकन किया जा रहा है । जबकि यह विकसित भूखण्ड 50% से ज्यादा नहीं हो सकता है । इसकी गणना करने में हितग्राही को काफी समस्याएँ उत्पन्न होती है । यदि इस फार्मूले से गणना की जाती है, तब क्षेत्रफल औसतन 82% निकलता है, जो कि दूसरे प्रदेशों से भिन्न है, जिसके कारण ग्वालियर में निवेशक आकर्षित नहीं हो रहे हैं । परिणाम स्वरूप ग्वालियर के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है  । अतः कृषि भूमि के क्रय-विक्रय पर संपादित होने वाले दस्तावेजों पर विक्रित रकबे में प्रथम हजार वर्ग मीटर भूमि को औसतन 50% के मान से मूल्यांकन किया जाकर, शेष भूमि पर कृषि भूमि की दर से मूल्यांकन किया जाना उचित होगा, जिससे निवेशक भी आकर्षित होंगे और हितग्राही को भी गणना करने में काफी आसानी होगी ।

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