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भारतीय संगीत की जननी है ध्रुपद, इसका ग्वालियर से है पुराना नाता: पद्मश्री उस्ताद वासिफुद्दीन डागर


- राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय में शुरू हुए तीन दिवसीय बैजू बावरा महोत्सव के पहले दिन विद्वानों में ध्रुपद और धमार शैलियों पर अपने विचार रखे।
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संगीत की बारीकियों को समझते वक्त यह भी ध्यान में रखें कि आपके स्वयं के  मन पर संगीत का क्या प्रभाव पड़ रहा है। संगीत में स्वर का स्वर का अध्ययन करने से पूर्व अपने अंदर के ' स ' को खोजने का प्रयास करें।
यह भी जानना जरूरी है कि  ध्रुपद शैली भारतीय संगीत की जननी है। ख्याल, दादरा, ठुमरी, टप्पा आदि इसके बाद ही अस्तित्व में आए हैं। और ग्वालियर का ध्रुपद से पुराना जुड़ाव रहा है।
भारतीय संगीत की 
शास्त्रीय संगीत का प्रभाव कभी कम नहीं हुआ। यही कारण है कि  ध्रुपद आज 20 वीं पीढ़ी के साथ भी चल रहा है। 
शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने के लिए निजी चैनलों को आगे आकर प्रचार प्रसार करना चाहिए। 
यह बात दिल्ली से आए
पद्मश्री उस्ताद वासिफुद्दीन डागर ने कही।
वह राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय में तीन दिवसीय बैजू बावरा महोत्सव के शुभारंभ अवसर पर ' भारतीय ज्ञान परंपरा: ध्रुपद गायन शैली का परंपरागत एवं वर्तमान स्वरूप ' विषय पर 
बतौर बतौर विषय विशेषज्ञ बोल रहे थे। 
संगीत विश्वविद्यालय और प्रयास शिक्षा, साहित्य, कल व संगीत पीठ समिति के संयुक्त तत्वाधान में शुरू हुए इस महोत्सव के पहले दिन विद्वानों ने ध्रुपद शैली की बारीकियों से छात्र छात्राओं को परिचित कराया साथ ही संगीत की विधाओं का प्रदर्शन भी हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि ललित नारायण मिथिला मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा, बिहार से आई लावण्य कीर्ति सिंह रही। 
 कार्यक्रम में विद्वानों के रूप में नई दिल्ली से आए पं. मोहन श्याम शर्मा ने भी विषय पर अपने विचार रखे।
 कुलगुरु प्रो स्मिता सहस्त्रबुद्धे की अध्यक्षता में हुए कार्यक्रम में कुलसचिव अरुण सिंह चौहान, वित्त नियंत्रक डॉ आशुतोष खरे,
विद्या परिषद के अशोक आनंद, अनूप मोघे,
प्रयास समित के कार्यकारी प्रो नीरज कुमार झा सहित शहर के कई गणमान्य नागरिक व छात्र छात्राएं मौजूद रहे। संचालन सांस्कृतिक समिति समन्वयक डॉ पारुल दीक्षित ने किया।

*परंपराओं में बंधा हुआ है शास्त्रीय संगीत*
 ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा, बिहार से आई लावण्य कीर्ति सिंह ने कहा कि
ग्वालियर शहर संगीत की नगरी है। इसके बिना संगीत की कल्पना करना संभव नहीं है। वर्तमान में हमें परंपराओं से जुड़ने की जरूरत है। भारतीय शास्त्रीय संगीत परंपराओं से बंधा हुआ है और परंपराओं के साथ ही वह लगातार बढ़ता रहा। अध्ययन करने पर पता चलता है कि संगीत शास्त्र और प्रदर्शन दोनों से चलता है और किसी एक के बिना भी संगीत अधूरा है। 

*चौताल में  बैजू का पद*
कार्यक्रम के दौरान संगीत विभाग के छात्र छात्राओं ने बैजू द्वारा रचित पद की राग जौनपुरी, ताल चौताल में संगीतमय प्रस्तुति दी, जिसके बोल थे जहां लगी..। पखावज पर  संगति जयवंत गायकवाड़ ने की।

*अन्य तालों से अलग है ताल धमार*

पं. मोहन श्याम शर्मा (नई दिल्ली) ने पखावज सह प्रदर्शन के दौरान  कहा कि ताल धमार अन्य तालों से कुछ अलग है। वैसे ही पखावज और तबले में भी अंतर होता है। पखावज में देवी देवताओ की स्तुति के साथ टुकड़े, छंद, रेला आदि शामिल होते हैं। तबले की परन में तिहाई होती है,जबकि पखावज की परन में तिहाई का अभाव होता है। इस दौरान उन्होंने ताल धमार में पखावज पर अद्भुत प्रदर्शन भी किया। उनके साथ अब्दुल हमीद ने लहरा संगति की।

*तेरो मन में कितनो गुन*
शहर की युवा कलाकार योगिनी तांबे ने ध्रुपद की मनोहर प्रस्तुति दी। उन्होंने 
राग भुपाली में सर्वप्रथम आलाप, मध्यलय आलाप, द्रुत लय आलाप, तत्पश्चात चौताल में निबद्ध बंदिश जिसके बोल तान तलवार की, और जलदसूल में निबध्द बंदिश जिसके बोल - तेरो मन में कितनो गुन रे...। उनके साथ पखावज पर जगत नारायण ने संगति की।

*राग मुल्तानी में बैजू की बंदिश*
इसी क्रम में पद्मश्री वासिफुद्दीन डागर ने  राग मुल्तानी में नोम तोम आलाप  जोड़ झाला प्रस्तुत किया। फिर बैजू बावरा की बंदिश प्रस्तुत की, जिसके बोल थे बंसीधर, पिनाकधार...।
उनके साथ पं. मोहन श्याम शर्मा (नई दिल्ली) ने पखावज पर संगति की।

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